श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 4: भगवान् ऋषभदेव के लक्षण  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  5.4.16 
यद्यपि स्वविदितं सकलधर्मं ब्राह्मं गुह्यं ब्राह्मणैर्दर्शितमार्गेण सामादिभिरुपायैर्जनतामनुशशास ॥ १६ ॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि भगवान ऋषभदेव समस्त गुह्य वैदिक ज्ञान से परिचित थे, जिसमें सभी करणीय कर्मों से सम्बन्धित जानकारी सम्मिलित थी, तो भी वे अपने को क्षत्रिय मानकर ब्राह्मणों के उन उपदेशों का अनुसरण करते थे, जिनका सम्बन्ध साम (मन पर नियंत्रण), दम (इन्द्रियों पर नियंत्रण), तितिक्षा (सहनशीलता) इत्यादि से था। इस प्रकार उन्होंने वर्णाश्रम-धर्म पद्धति से जनता पर शासन किया। इसके अनुसार ब्राह्मण क्षत्रियों को शिक्षा देता है और क्षत्रिय वैश्यों तथा शूद्रों के माध्यम से राज्य चलाता था।
 
Although Lord Rishabhdev was acquainted with all the deep Vedic knowledge, which includes information related to all the actions to be performed, he still considered himself a Kshatriya and followed the teachings of the Brahmins, which were related to Sama (control over the mind), Dama (control over the senses), Titiksha (tolerance) etc. Thus he ruled the people according to the Varnashram-Dharma system. According to this, the Brahmins educate the Kshatriyas and the Kshatriyas run the state through the Vaishyas and Shudras.
तात्पर्य
हालांकि ऋषभदेव सारे वैदिक निर्देशों को बेहतरीन ढंग से जानते थे इसके बावजूद सामाजिक व्यवस्था को कायम रखने के लिए उन्होंने ब्राह्मणों के निर्देशों का पालन किया। ब्राह्मण शास्त्रों के अनुसार सलाह देते थे और बाकी सभी जातियां उस सलाह का पालन करती थीं। ब्रह्म का अर्थ है “सारे कामों का परिपूर्ण ज्ञान” और इस ज्ञान का वर्णन वैदिक साहित्यों में बहुत गुप्त तरीके से किया गया है। ब्राह्मणों के रूप में पूरी तरह प्रशिक्षित पुरुषों को सारा वैदिक साहित्य पता होना चाहिए और इस साहित्य से मिलने वाले लाभ को आम जनता तक पहुँचाना चाहिए। आम जनता को परिपूर्ण ब्राह्मण का पालन करना चाहिए। इस तरह से कोई व्यक्ति अपने दिमाग और इंद्रियों पर नियंत्रण करना सीख सकता है और धीरे-धीरे साधना परिपूर्णता की ओर बढ़ता जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)