महापुरुषों के कर्मों की अनुकृति करना आम लोगों का स्वभाव है।
Ordinary people imitate the way great men behave.
तात्पर्य
एक ऐसा ही श्लोक भगवद्-गीता (3.21) में भी मिलता है। मानव समाज के लिए यह जरूरी है कि वेदों के ज्ञान अनुसार यथास्थान ब्राह्मण के रूप में कुछ पुरुषों का एक भाग हो जो प्रशिक्षित हों। ब्राह्मणत्व का पात्र नहीं होने वाले लोग जैसे- व्यवस्थापक, व्यापारी और कारीगर को उन बौद्धिक लोगों से शिक्षा लेनी चाहिए जिन्हें आदर्श माना जाता है। इस प्रकार से हर कोई परात्पर पद को पा सकता है और भौतिक अनासक्ति से मुक्त हो सकता है। भगवान श्रीकृष्ण ने इस भौतिक संसार को स्वयं दुखालयम अशाश्वतम कहा है जो दरिद्रता का एक अस्थायी स्थान है। कोई भी यहाँ नहीं रह सकता है भले ही वो दरिद्रता के साथ समझौता कर ले। इस शरीर का त्याग करना होगा और दूसरा शरीर स्वीकार करना होगा जो कि शायद मानव शरीर ना भी हो। जैसे ही कोई भौतिक शरीर प्राप्त करता है, वह देह-भृत या देही बन जाता है। कुछ शब्दों में कहा जाए तो वह सारी भौतिक स्थितियों का आधीन हो जाता है। समाज के नेताओं को इतना आदर्श होना चाहिए कि उनका पालन करने से भौतिक अस्तित्व के पंजों से मुक्त हुआ जा सके।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥