भगवानृषभसंज्ञ आत्मतन्त्र: स्वयं नित्यनिवृत्तानर्थपरम्पर: केवलानन्दानुभव ईश्वर एव विपरीतवत्कर्माण्यारभमाण: कालेनानुगतं धर्ममाचरणेनोपशिक्षयन्नतद्विदां सम उपशान्तो मैत्र: कारुणिको धर्मार्थयश: प्रजानन्दामृतावरोधेन गृहेषु लोकं नियमयत् ॥ १४ ॥
अनुवाद
भगवान् ऋषभदेव पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान के अवतार थे। इसलिए वह पूर्ण स्वतंत्र थे। उनका स्वरूप शाश्वत और दिव्य आनंदमय था। उन्हें भौतिक जन्म, मृत्यु, जरा और व्याधि से कोई सरोकार नहीं था। वह भौतिक दृष्टि से आसक्त नहीं थे। वह समानदर्शी थे। किसी को दुखी देखकर दुखी होते थे। वह सभी जीवों के शुभचिन्तक थे। वह महान पुरुष, परमेश्वर और सर्व-नियंता थे। लेकिन वह किसी सामान्य बद्ध-जीव की तरह ही व्यवहार करते थे। उन्होंने दृढ़तापूर्वक वर्णाश्रम धर्म का पालन किया और तदनुसार कर्म किए। समय के साथ, वर्णाश्रम धर्म के नियम उपेक्षित हो गए थे। इसलिए, अपने व्यक्तिगत गुणों और आचरण से, उन्होंने अज्ञानी जनता को वर्णाश्रम धर्म के तहत कर्तव्यों का पालन करना सिखाया। इस प्रकार, उन्होंने आम लोगों को गृहस्थाश्रम में प्रशिक्षित किया, जिससे वे धार्मिक और आर्थिक रूप से उन्नत हो सकें और यश, संतान, आनंद और अंत में शाश्वत जीवन प्राप्त कर सकें। अपने उपदेशों से, उन्होंने लोगों को गृहस्थाश्रम में रहते हुए वर्णाश्रम धर्म के नियमों का पालन करते हुए परिपूर्ण बनने की शिक्षा दी।
Being the incarnation of the Supreme Personality of Godhead, Lord Rishabhadeva was completely independent because this form of His was eternal and transcendentally blissful. He was not concerned with the four laws of material suffering (birth, death, old age and disease), nor was He attached to material things. He was equal-sighted. He felt sad seeing others suffering. He was a well-wisher of all living entities. Although He was the great Person, the Supreme Lord and the All-Controller, He was behaving as if He were an ordinary conditioned soul. Therefore, He strictly followed the Varnashrama Dharma and acted accordingly. In course of time, the rules of Varnashrama Dharma had been neglected, so by His personal qualities and conduct He taught the ignorant people to perform their duties under the Varnashrama Dharma. Thus He trained ordinary people in the Grihasthashrama Ashrama so that they could rise religiously and economically and attain fame, progeny, bliss and finally eternal life. Through his teachings, he taught people to become perfect by living in the Grahasthashram and following the rules of Varnashram Dharma.
तात्पर्य
वर्णाश्रम-धर्म अपूर्ण, बद्ध आत्माओं के लिए है। यह उन्हें आध्यात्मिक रूप से उन्नत होने के लिए प्रशिक्षित करता है ताकि वे घर लौट सकें, भगवान के पास वापस जा सकें। एक ऐसी सभ्यता जो जीवन के सर्वोच्च उद्देश्य को नहीं जानती, वह किसी पशु समाज से बेहतर नहीं है। जैसा कि श्रीमद्-भागवतम में कहा गया है: न ते विदुः स्वार्थ-गतिं हि विष्णुम्। मानव समाज का उद्देश्य आध्यात्मिक ज्ञान तक उन्नति करना है ताकि सभी लोग जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे और बीमारी के चंगुल से मुक्त हो सकें। वर्णाश्रम-धर्म मानव समाज को माया के चंगुल से बाहर निकलने के लिए पूरी तरह से फिट बनने में सक्षम बनाता है, और वर्णाश्रम-धर्म के विनियामक सिद्धांतों का पालन करके कोई भी सफल हो सकता है। इस संबंध में, भगवद्-गीता 3.21-24 देखें।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥