उपर्युक्त उन्नीस पुत्रों के अतिरिक्त, ऋषभदेव और जयन्ती से इक्यासी अन्य पुत्र भी थे। अपने पिता के आदेश के अनुसार, वे अत्यधिक सुसंस्कृत, शालीन, उज्ज्वल कर्म वाले और वैदिक ज्ञान और अनुष्ठानिक कार्यों में निपुण बन गए। इस प्रकार, वे सभी पूर्ण रूप से योग्य ब्राह्मण बन गए।
Apart from the above mentioned nineteen sons, Rishabhdev and Jayanti had eighty-one more sons. As per their father's instructions, they became very cultured, well behaved, had good deeds and were proficient in Vedic knowledge and ritualistic works. Thus all of them became fully qualified Brahmins.
तात्पर्य
इस श्लोक से हमें इस बात की अच्छी जानकारी मिलती है कि जातियाँ गुण और कर्म के अनुसार कैसे निर्धारित की जाती हैं। ऋषभदेव, एक राजा, निश्चित रूप से एक क्षत्रिय थे। उनके सौ पुत्र थे, और इनमें से दस क्षत्रियों के रूप में नियुक्त किए गए और ग्रह पर शासन किया। नौ पुत्र श्रीमद्-भागवतम (महा-भाagवत) के अच्छे प्रचारक बन गए, और इससे यह संकेत मिलता है कि वे ब्राह्मणों के पद से ऊपर थे। अन्य अस्सी-एक पुत्र अत्यधिक योग्य ब्राह्मण बन गए। ये कुछ व्यावहारिक उदाहरण हैं कि कैसे कोई व्यक्ति जन्म से नहीं, बल्कि योग्यता से एक निश्चित प्रकार की गतिविधि के लिए उपयुक्त बन सकता है। महाराज ऋषभदेव के सभी पुत्र जन्म से क्षत्रिय थे, लेकिन गुण से कुछ क्षत्रिय बन गए, और कुछ ब्राह्मण बन गए। नौ श्रीमद्-भागवतम (भाagवत-धर्म-दर्शनाः) के प्रचारक बने, जिसका अर्थ है कि वे क्षत्रिय और ब्राह्मण की श्रेणियों से ऊपर थे।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥