अथानयापि न भवत इज्ययोरुभारभरया समुचितमर्थमिहोपलभामहे ॥ ७ ॥
अनुवाद
हमने आपकी पूजा में आपको अनेक वस्तुएँ अर्पित की हैं और आपके लिए अनेक यज्ञ किए हैं, किन्तु हमारा मानना है कि आपको प्रसन्न करने के लिए इतनी सारी व्यवस्थाओं की आवश्यकता नहीं है।
We have offered many things to You in worship and performed many sacrifices for You, but We feel that there is no need for so many ceremonies to please You.
तात्पर्य
श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं कि यदि कोई विविध प्रकार के भोजन की पेशकश की जाती है, लेकिन उसकी भूख नहीं है तो प्रसाद का कोई मूल्य नहीं है। भगवान श्रीकृष्ण की संतुष्टि के लिए एक बड़े यज्ञ अनुष्ठान में कई चीजें एकत्रित हो सकती हैं, लेकिन अगर भगवान के लिए भक्ति, लगाव या प्रेम नहीं है, तो व्यवस्था बेकार है। भगवान स्वयं पूर्ण हैं और उन्हें हमसे कुछ भी चाहिए नहीं। हालाँकि, अगर हम उन्हें थोड़ा पानी, एक फूल और तुलसी का पत्ता चढ़ाते हैं तो वे उन्हें स्वीकार करेंगे। भक्ति, भक्ति सेवा, भगवान श्रीकृष्ण को संतुष्ट करने का मुख्य तरीका है। यह बड़े बड़े यज्ञों की व्यवस्था करने का प्रश्न नहीं है। पुजारी पछता रहे थे, यह सोचकर कि वे भक्ति सेवा के पथ पर नहीं थे और उनका बलिदान भगवान को प्रसन्न नहीं कर रहा था।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥