श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 3: राजा नाभि की पत्नी मेरुदेवी के गर्भ से ऋषभदेव का जन्म  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  5.3.6 
परिजनानुरागविरचितशबलसंशब्दसलिलसितकिसलयतुलसिकादूर्वाङ्कुरैरपि सम्भृतया सपर्यया किल परम परितुष्यसि ॥ ६ ॥
 
 
अनुवाद
हे परमेश्वर, आप हर तरह से पूर्ण हैं। जब आपके भक्त गद्गद् वाणी से आपकी स्तुति करते हैं तथा आनंद से तुलसीदल, जल, पल्लव और दूब के अंकुर चढ़ाते हैं, तो आप निश्चय ही परम सन्तुष्ट हो जाते हैं।
 
O Supreme Lord, You are complete in every way. When Your devotees praise You with tearful voices and offer You Tulsi leaves, water, leaves and sprouts of grass in joy, You are certainly extremely satisfied.
तात्पर्य
भगवान सर्वोत्तम पुरुष की संतुष्टि के लिए अत्यधिक संपत्ति, शिक्षा या आडंबर की आवश्यकता नहीं होती है। यदि कोई पूरी तरह से प्रेम और परमानंद में लीन है, तो उसे केवल एक फूल और थोड़ा पानी देना होगा। जैसा कि भगवद्-गीता में कहा गया है, पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति: "यदि कोई मुझे प्रेम और भक्ति के साथ एक पत्ता, एक फूल, फल या पानी देगा, तो मैं इसे स्वीकार करूँगा।" (गीता 9.26)

केवल भक्ति सेवा से ही सर्वोच्च भगवान प्रसन्न हो सकते हैं; इसलिए यहाँ यह कहा गया है कि भगवान निश्चित रूप से भक्ति और कुछ नहीं से संतुष्ट हैं। गौतमीय-तंत्र से उद्धृत करते हुए, हरि-भक्ति-विलास कहता है:

तुलसी-दल-मात्रेण

जलस्य चुलुकेन वा

विक्रीणीते स्वम आत्मानम्

भक्तेभ्यो भक्त-वत्सलः

"श्री कृष्ण, जो अपने भक्तों के प्रति बहुत ही स्नेही हैं, खुद को उस भक्त को बेच देते हैं जो केवल एक तुलसी का पत्ता और मुट्ठी भर पानी देता है।" सर्वोच्च भगवान बिना किसी कारण के अपने भक्त पर दया करते हैं, इतना कि मनुष्यों में सबसे निर्धन भी उन्हें भक्ति में थोड़ा सा पानी और फूल चढ़ा सकते हैं और इस प्रकार उन्हें प्रसन्न कर सकते हैं। यह उनके भक्तों के साथ उनके स्नेही व्यवहार के कारण है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)