केवल भक्ति सेवा से ही सर्वोच्च भगवान प्रसन्न हो सकते हैं; इसलिए यहाँ यह कहा गया है कि भगवान निश्चित रूप से भक्ति और कुछ नहीं से संतुष्ट हैं। गौतमीय-तंत्र से उद्धृत करते हुए, हरि-भक्ति-विलास कहता है:
तुलसी-दल-मात्रेण
जलस्य चुलुकेन वा
विक्रीणीते स्वम आत्मानम्
भक्तेभ्यो भक्त-वत्सलः
"श्री कृष्ण, जो अपने भक्तों के प्रति बहुत ही स्नेही हैं, खुद को उस भक्त को बेच देते हैं जो केवल एक तुलसी का पत्ता और मुट्ठी भर पानी देता है।" सर्वोच्च भगवान बिना किसी कारण के अपने भक्त पर दया करते हैं, इतना कि मनुष्यों में सबसे निर्धन भी उन्हें भक्ति में थोड़ा सा पानी और फूल चढ़ा सकते हैं और इस प्रकार उन्हें प्रसन्न कर सकते हैं। यह उनके भक्तों के साथ उनके स्नेही व्यवहार के कारण है।
