श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 3: राजा नाभि की पत्नी मेरुदेवी के गर्भ से ऋषभदेव का जन्म  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  5.3.20 
बर्हिषि तस्मिन्नेव विष्णुदत्त भगवान् परमर्षिभि: प्रसादितो नाभे: प्रियचिकीर्षया तदवरोधायने मेरुदेव्यां धर्मान्दर्शयितुकामो वातरशनानां श्रमणानामृषीणामूर्ध्वमन्थिनां शुक्लया तनुवावततार ॥ २० ॥
 
 
अनुवाद
हे विष्णुदत्त परीक्षित महाराज, उस यज्ञ के ऋषियों से भगवान अत्यन्त प्रसन्न हुए। फलस्वरूप उन्होंने स्वयं धर्माचरण करके दिखलाने (जैसा कि ब्रह्मचारी, संन्यासी, वानप्रस्थ तथा गृहस्थ करते हैं) और महाराज नाभि की मनोकामना को पूरा करने का निश्चय किया। अत: वे अपने गुणातीत आद्य सत्व रूप में मेरुदेवी के पुत्र के रूप में प्रकट हुए। उन्होंने इस प्रकार अपनी भक्ति को बढ़ाया।
 
O Vishnudatta Parikshit Maharaja, the Lord was very pleased with the sages of that sacrifice. As a result, He Himself decided to demonstrate Dharma (as Brahmacharis, Sanyasis, Vanaprasthas and Grihasthas do) and to fulfill the desire of Maharaja Nabhi. So He appeared in His Gunaatita Aadya Sattva form as the son of Meru Devi.
तात्पर्य
जब परम प्रभु इस भौतिक सृष्टि के भीतर अवतरित होते हैं या एक अवतार के रूप में प्रकट होते हैं, तो वे भौतिक प्रकृति के तीनों गुणों (सत-गुण, रजो-गुण और तमो-गुण) से बने शरीर को स्वीकार नहीं करते हैं। मायावादी दार्शनिकों का कहना है कि निर्वैयक्तिक भगवान सत-गुण में एक शरीर को स्वीकार करके इस भौतिक दुनिया में प्रकट होते हैं। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती बताते हैं कि शुकल शब्द का अर्थ है "शुद्ध सत से मिलकर"। भगवान विष्णु अपने शुद्ध सत रूप में अवतरित होते हैं। शुद्ध सत से उस सत-गुण का संदर्भ है जो कभी दूषित नहीं होता। इस भौतिक संसार में, भलाई का गुण (सत-गुण) भी रजो-गुण और तमो-गुण के रंगों से दूषित होता है। जब सत-गुण कभी भी रजो-गुण और तमो-गुण से दूषित नहीं होता, उसे शुद्ध सत कहा जाता है। सत्वं विशुद्धं वसुदेव-शब्दितम (भाग. 4.3.23)। वही वासुदेव का प्लेटफार्म है, जिसके माध्यम से भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व, वासुदेव, अनुभव किया जा सकता है। भगवद-गीता (4.7) में स्वयं श्री कृष्ण कहते हैं:

यदा यदा हि धर्मस्य

ग्लानिर्भवति भारत।

अभ्युत्थानम् अधर्मस्य

तदात्मानं सृजाम्यहम्।

"हे भारतवंशी, जब भी और जहाँ भी धार्मिक व्यवहार में गिरावट आती है, और अधर्म का प्रमुख उदय होता है - उस समय मैं स्वयं अवतरित होता हूँ।"

सामान्य जीवित हस्तियों के विपरीत, परम प्रभु भौतिक प्रकृति के गुणों द्वारा प्रकट होने के लिए बाध्य नहीं हैं। वह प्रकट होते हैं धर्मान दर्शयितु-काम - यह दिखाने के लिए कि एक मानव होने के कार्यों को कैसे निष्पादित किया जाए। धर्म शब्द का अर्थ मनुष्य के लिए है और निम्न जीवों, जैसे कि पशुओं के संबंध में कभी भी इसका उपयोग नहीं किया जाता है। दुर्भाग्यवश, परम प्रभु द्वारा निर्देशित किए बिना, मनुष्य कभी-कभी धर्म की एक प्रक्रिया का निर्माण करते हैं। वास्तव में धर्म मनुष्य द्वारा नहीं बनाया जा सकता। धर्मं तु साक्षाद भगवत्-प्रणीतम। (भाग. 6.3.19) धर्म भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व द्वारा दिया जाता है, जैसे कानून राज्य सरकार द्वारा दिया जाता है। मनुष्य निर्मित धर्म का कोई अर्थ नहीं है। श्रीमद-भागवतम मनुष्य निर्मित धर्म को कैतव-धर्म के रूप में संदर्भित करता है, जो धर्म को धोखा देता है। परम प्रभु मानव समाज को धार्मिक सिद्धांतों को निष्पादित करने का उचित तरीका सिखाने के लिए एक अवतार (अवतार) भेजते हैं। ऐसे धार्मिक सिद्धांत भक्ति-मार्ग हैं। जैसा कि स्वयं परम प्रभु भागवद-गीता में कहते हैं: सर्व-धर्मान परित्यज्य माम एकं शरणं व्रज। महाराज नाभि के पुत्र, ऋषभदेव, धर्म के सिद्धांतों का प्रचार करने के लिए इस धरती पर प्रकट हुए। यह इस पंचम खंड के पंचम अध्याय में समझाया जाएगा।

 
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध पांच के अंतर्गत तीसरा अध्याय समाप्त होता है ।
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)