यदा यदा हि धर्मस्य
ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानम् अधर्मस्य
तदात्मानं सृजाम्यहम्।
"हे भारतवंशी, जब भी और जहाँ भी धार्मिक व्यवहार में गिरावट आती है, और अधर्म का प्रमुख उदय होता है - उस समय मैं स्वयं अवतरित होता हूँ।"
सामान्य जीवित हस्तियों के विपरीत, परम प्रभु भौतिक प्रकृति के गुणों द्वारा प्रकट होने के लिए बाध्य नहीं हैं। वह प्रकट होते हैं धर्मान दर्शयितु-काम - यह दिखाने के लिए कि एक मानव होने के कार्यों को कैसे निष्पादित किया जाए। धर्म शब्द का अर्थ मनुष्य के लिए है और निम्न जीवों, जैसे कि पशुओं के संबंध में कभी भी इसका उपयोग नहीं किया जाता है। दुर्भाग्यवश, परम प्रभु द्वारा निर्देशित किए बिना, मनुष्य कभी-कभी धर्म की एक प्रक्रिया का निर्माण करते हैं। वास्तव में धर्म मनुष्य द्वारा नहीं बनाया जा सकता। धर्मं तु साक्षाद भगवत्-प्रणीतम। (भाग. 6.3.19) धर्म भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व द्वारा दिया जाता है, जैसे कानून राज्य सरकार द्वारा दिया जाता है। मनुष्य निर्मित धर्म का कोई अर्थ नहीं है। श्रीमद-भागवतम मनुष्य निर्मित धर्म को कैतव-धर्म के रूप में संदर्भित करता है, जो धर्म को धोखा देता है। परम प्रभु मानव समाज को धार्मिक सिद्धांतों को निष्पादित करने का उचित तरीका सिखाने के लिए एक अवतार (अवतार) भेजते हैं। ऐसे धार्मिक सिद्धांत भक्ति-मार्ग हैं। जैसा कि स्वयं परम प्रभु भागवद-गीता में कहते हैं: सर्व-धर्मान परित्यज्य माम एकं शरणं व्रज। महाराज नाभि के पुत्र, ऋषभदेव, धर्म के सिद्धांतों का प्रचार करने के लिए इस धरती पर प्रकट हुए। यह इस पंचम खंड के पंचम अध्याय में समझाया जाएगा।
