भक्त्या मामभिजानाति
यावान्य चासमि तत्त्वतः
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा
विशते तदनंतरम्
'भक्ति-भावना से ही सर्वोच्च पुरुष का तत्वत: ज्ञान प्राप्त हो सकता है। जब कोई पूर्ण रूप से पूर्ण भक्ति से भगवान के चेतन स्वरूप का ज्ञान हो जाता है, तो वह भगवान के धाम में प्रवेश कर जाता है।' (भगवद-गीता 18.55)
भक्तिपूर्ण सेवा द्वारा ही व्यक्ति सर्वोच्च पुरुष का ज्ञान और दर्शन कर सकता है, अन्य किसी प्रकार से नहीं। महाराज नाभि यद्यपि विधि-विधान एवं यज्ञ करते थे फिर भी यह माना जाना चाहिए कि भगवान उनके समक्ष उनके यज्ञों के कारण नहीं वरन् उनकी भक्तिभावना के कारण ही प्रकट हुए थे। इस कारण ही भगवान अपने सुंदर शारीरिक रूप में उनके समक्ष प्रकट होने की स्वीकृति दी। जैसा कि ब्रह्म-संहिता (5.30) में बताया गया है, भगवान अपने मूल स्वरूप में अत्यंत सुंदर हैं। वेणुं क्वणन्तम अरविंद-दलायताक्षं बार्हावतंस असितांबुद-सुंदरांगम्: सर्वोच्च पुरुष, यद्यपि काले हैं, परंतु अति सुंदर हैं।
