श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 3: राजा नाभि की पत्नी मेरुदेवी के गर्भ से ऋषभदेव का जन्म  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  5.3.15 
यदु ह वाव तव पुनरदभ्रकर्तरिह समाहूतस्तत्रार्थधियां मन्दानां नस्तद्यद्देवहेलनं देवदेवार्हसि साम्येन सर्वान् प्रतिवोढुमविदुषाम् ॥ १५ ॥
 
 
अनुवाद
हे भगवान, आप अनेक अद्भुत कार्य कर सकते हैं। इस यज्ञ का उद्देश्य केवल पुत्र प्राप्ति करना था, इसलिए हमारी बुद्धि प्रखर नहीं है। हमें जीवन का लक्ष्य निर्धारित करने का कोई अनुभव नहीं है। निश्चित ही, भौतिक लक्ष्य की प्राप्ति हेतु किये गये इस तुच्छ यज्ञ में आपको आमंत्रित करके, हमने आपके पवित्र चरणों में महान पाप किया है। अत: हे सर्वेश्वर, अपनी असीम कृपा और सम दृष्टि के कारण हमें क्षमा करें।
 
O Lord, you are capable of performing many wonderful deeds. Our sole aim in performing this yajna was to obtain a son, so our intellect is not very sharp. We have no experience in setting life goals. Indeed, by inviting you to this trivial yajna performed for the attainment of material goals, we have committed a great sin at your lotus feet. Therefore, O Lord of all, please forgive us due to your causeless mercy and equal vision.
तात्पर्य
**हिंदी-पाठ:**

पुजारियों को वैकुण्ठ से सर्वोच्च भगवान को ऐसी तुच्छ वजह के लिए बुलाने से निश्चित रूप से अप्रसन्नता हुई थी। एक शुद्ध भक्त कभी भी भगवान को व्यर्थ में देखना नहीं चाहता। भगवान विभिन्न कार्यों में लगे रहते हैं, और शुद्ध भक्त उन्हें अपनी इंद्रियतृप्ति के लिए सनकीपन से नहीं देखना चाहता। शुद्ध भक्त केवल भगवान की कृपा पर निर्भर रहता है, और जब भगवान प्रसन्न होते हैं, तो वह उन्हें आमने-सामने देख सकता है। भगवान श्री ब्रह्मा और भगवान शिव जैसे देवताओं द्वारा भी नहीं देखे जाते। नभि महाराजा के पुरोहितों ने सर्वोच्च भगवान को बुलाकर खुद को अज्ञानी साबित कर दिया; फिर भी, भगवान अपनी अकारण दया से बाहर आए। इसलिए वे सभी भगवान से क्षमा पाना चाहते थे।

भौतिक लाभ के लिए सर्वोच्च भगवान की पूजा अधिकारियों द्वारा अनुमोदित नहीं है। जैसा कि भगवद्-गीता (7.16) में कहा गया है:

चतुर्-विधा भजन्ते माम

जना: सुकृतिनो अ्र्जुन

आर्तो जिज्ञासुर अर्थार्थी

ज्ञान च भरतर्षभ

"हे भरतों में श्रेष्ठ [अर्जुन], चार प्रकार के पवित्र पुरुष मुझमें भक्ति सेवा प्रदान करते हैं - संकटग्रस्त, धन का इच्छुक, जिज्ञासु और वह जो निरपेक्ष की खोज में है।"

भक्ति में दीक्षा तब शुरू होती है जब व्यक्ति संकट की स्थिति में होता है या धन की आवश्यकता होती है, या जब व्यक्ति निरपेक्ष सत्य को समझने के लिए जिज्ञासु होता है। फिर भी, जो लोग इस तरह से सर्वोच्च भगवान के पास आते हैं, वे वास्तव में भक्त नहीं हैं। निरपेक्ष सत्य, भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के बारे में पूछताछ करने के कारण उन्हें पवित्र (सुकृतिनः) के रूप में स्वीकार किया जाता है। भगवान की विभिन्न गतिविधियों और व्यस्तताओं को न जानते हुए, ऐसे लोग भौतिक लाभ के लिए भगवान को अनावश्यक रूप से परेशान करते हैं। हालाँकि, भगवान इतने दयालु हैं कि परेशान होने के बावजूद, वह ऐसे भिखारियों की इच्छाओं को पूरा करते हैं। शुद्ध भक्त अन्याभिलाषिता-शुना है; उसकी पूजा के पीछे कोई उद्देश्य नहीं होता। वह कर्म या ज्ञान के रूप में माया के प्रभाव से संचालित नहीं होता है। शुद्ध भक्त व्यक्तिगत विचार के बिना भगवान के आदेश को निष्पादित करने के लिए हमेशा तैयार रहता है। ऋत्विज़, बलिदान में पुरोहित, कर्म और भक्ति के बीच के अंतर को अच्छी तरह से जानते थे, और क्योंकि वे खुद को कर्म, फलदायी गतिविधि के प्रभाव में मानते थे, उन्होंने भगवान से क्षमा मांगी। वे जानते थे कि भगवान को किसी छोटे कारण से आने के लिए आमंत्रित किया गया था।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)