दैवी ह्येषा गुण-मयी
मम माया दुरात्याया
" भौतिक प्रकृति के तीनों गुणों वाली, यह मेरी दिव्य ऊर्जा, विजय प्राप्त करना कठिन है।" केवल एक भक्त ही माया के महान प्रभाव को पार कर सकता है। महाराजा नाभि की ओर से यह कोई दोष नहीं था कि वह एक पुत्र चाहते थे। वह परमेश्वर के समान एक पुत्र चाहते थे, जो सभी पुत्रों में सर्वश्रेष्ठ है। भगवान के भक्त के सहयोग से, व्यक्ति भौतिक वैभव की इच्छा नहीं करता है। चैतन्य-चरितामृत (मध्य 22.54) में इसकी पुष्टि की गई है:
'साधु-संग', 'साधु-संग' सर्व-शास्त्रे कय
लव-मात्र साधु-संग सर्व-सिद्धि हय
और:
महत्-कृपा बिना कोन कर्मे 'भक्ति' नय
कृष्ण-भक्ति दूर रहु, संसार नहे क्षय
यदि व्यक्ति माया के प्रभाव से बचने और परमेश्वर के पास वापस लौटने को लेकर गंभीर है, तो उसे साधु (भक्त) के साथ संगति करनी चाहिए। सभी शास्त्रों का यही निर्णय है। भक्त के सहयोग से, व्यक्ति माया के चंगुल से मुक्त हो सकता है। शुद्ध भक्त की कृपा के बिना, व्यक्ति किसी भी तरह से मुक्ति नहीं पा सकता है। निश्चित रूप से भगवान की प्रेममय सेवा प्राप्त करने के लिए एक शुद्ध भक्त का सहयोग आवश्यक है। एक महान भक्त के वरदान साधु-संग के बिना व्यक्ति माया के चंगुल से मुक्त नहीं हो सकता है। श्रीमद-भागवतम् (7.5.32) में प्रह्लाद महाराजा कहते हैं:
नैषां मतिस्तावदुरुकमक्रमांघ्रिं
स्पृशत्यनर्थापगमो यदर्थः
महीयाँ पाद-रजो-'भिषेकं
निष्किंचनानां न वृणीत यावत्
कोई व्यक्ति महान भक्त के सिर पर धूल (पाद-रजो-'भिषेकम) लिए बिना भगवान का शुद्ध भक्त नहीं बन सकता। एक शुद्ध भक्त निष्किंचन होता है; उसे भौतिक दुनिया का आनंद लेने की कोई भौतिक इच्छा नहीं होती है। उसके गुणों को प्राप्त करने के लिए ऐसी शुद्ध भक्त की शरण लेनी पड़ती है। शुद्ध भक्त हमेशा माया और उसके प्रभाव के चंगुल से मुक्त होता है।
