श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 3: राजा नाभि की पत्नी मेरुदेवी के गर्भ से ऋषभदेव का जन्म  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  5.3.14 
को वा इह तेऽपराजितोऽपराजितया माययानवसितपदव्यानावृतमतिर्विषयविषरयानावृतप्रकृतिरनुपासितमहच्चरण: ॥ १४ ॥
 
 
अनुवाद
हे ईश्वर, जब तक कोई व्यक्ति महान भक्तों के चरणकमलों में शरण नहीं लेता, तब तक माया उसे परास्त करती रहेगी और उसकी बुद्धि मोहग्रस्त बनी रहेगी। सचमुच, ऐसा कौन है जो विष के समान भौतिक सुखों की लहरों में बह न गया हो! तुम्हारी माया अजेय है। कोई भी इस माया के पथ को नहीं देख सकता है और न ही कोई यह बता सकता है कि यह कैसे काम करती है।
 
O Lord, as long as a man does not worship the feet of the supreme devotee, Maya will continue to defeat him and his intellect will remain bewildered. Indeed, who is there who has not been swept away by the waves of material pleasures which are like poison! Your Maya is formidable. No one can see the path of this Maya, nor can anyone explain its workings.
तात्पर्य
महाराजा नाभि एक पुत्र की प्राप्ति के लिए महान यज्ञ करने के इच्छुक थे। पुत्र परमेश्वर के समान महान हो सकता है, परंतु ऐसी भौतिक इच्छा -- चाहे वह महान हो या तुच्छ -- माया के प्रभाव के कारण ही होती है। भक्त इंद्रिय-तृप्ति के लिए कुछ भी नहीं चाहता है। इसलिए भक्ति को भौतिक इच्छाओं से रहित बताया गया है (अन्याभिलाषिता-शून्य)। हर कोई माया के प्रभाव में है और सभी प्रकार की भौतिक इच्छाओं में उलझा हुआ है, और महाराजा नाभि कोई अपवाद नहीं थे। माया के प्रभाव से मुक्ति तभी संभव है जब कोई महान भक्तों (महाचरण-सेवा) की सेवा में लगे। एक महान भक्त के चरण-कमलों की पूजा किए बिना, व्यक्ति माया के प्रभाव से मुक्त नहीं हो सकता। श्रील नरोत्तम दास ठाकुर इसलिए कहते हैं, छोड़िया वैष्णव-सेवा निस्तार पायेचे केबा: "किसने वैष्णव के चरण-कमलों की सेवा किए बिना माया के चंगुल से मुक्ति पाई है?" माया अपराजिता है, और उसका प्रभाव भी अपराजिता है। जैसा कि भगवद्-गीता (7.14) में पुष्टि की गई है:

दैवी ह्येषा गुण-मयी

मम माया दुरात्याया

" भौतिक प्रकृति के तीनों गुणों वाली, यह मेरी दिव्य ऊर्जा, विजय प्राप्त करना कठिन है।" केवल एक भक्त ही माया के महान प्रभाव को पार कर सकता है। महाराजा नाभि की ओर से यह कोई दोष नहीं था कि वह एक पुत्र चाहते थे। वह परमेश्वर के समान एक पुत्र चाहते थे, जो सभी पुत्रों में सर्वश्रेष्ठ है। भगवान के भक्त के सहयोग से, व्यक्ति भौतिक वैभव की इच्छा नहीं करता है। चैतन्य-चरितामृत (मध्य 22.54) में इसकी पुष्टि की गई है:

'साधु-संग', 'साधु-संग' सर्व-शास्त्रे कय

लव-मात्र साधु-संग सर्व-सिद्धि हय

और:

महत्-कृपा बिना कोन कर्मे 'भक्ति' नय

कृष्ण-भक्ति दूर रहु, संसार नहे क्षय

यदि व्यक्ति माया के प्रभाव से बचने और परमेश्वर के पास वापस लौटने को लेकर गंभीर है, तो उसे साधु (भक्त) के साथ संगति करनी चाहिए। सभी शास्त्रों का यही निर्णय है। भक्त के सहयोग से, व्यक्ति माया के चंगुल से मुक्त हो सकता है। शुद्ध भक्त की कृपा के बिना, व्यक्ति किसी भी तरह से मुक्ति नहीं पा सकता है। निश्चित रूप से भगवान की प्रेममय सेवा प्राप्त करने के लिए एक शुद्ध भक्त का सहयोग आवश्यक है। एक महान भक्त के वरदान साधु-संग के बिना व्यक्ति माया के चंगुल से मुक्त नहीं हो सकता है। श्रीमद-भागवतम् (7.5.32) में प्रह्लाद महाराजा कहते हैं:

नैषां मतिस्तावदुरुकमक्रमांघ्रिं

स्पृशत्यनर्थापगमो यदर्थः

महीयाँ पाद-रजो-'भिषेकं

निष्किंचनानां न वृणीत यावत्

कोई व्यक्ति महान भक्त के सिर पर धूल (पाद-रजो-'भिषेकम) लिए बिना भगवान का शुद्ध भक्त नहीं बन सकता। एक शुद्ध भक्त निष्किंचन होता है; उसे भौतिक दुनिया का आनंद लेने की कोई भौतिक इच्छा नहीं होती है। उसके गुणों को प्राप्त करने के लिए ऐसी शुद्ध भक्त की शरण लेनी पड़ती है। शुद्ध भक्त हमेशा माया और उसके प्रभाव के चंगुल से मुक्त होता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)