हे ईश्वर, आपके चरणों में महाराज नाभि हैं, जिनका जीवन लक्ष्य सिर्फ इतना है कि आप जैसा पुत्र उन्हें प्रदान करें। हे भगवान, उनकी दशा बिलकुल वैसी ही है, जैसे कोई व्यक्ति किसी अमीर आदमी के पास जाता है और उससे अन्न मांगता है। उन्हें पुत्र की इतनी इच्छा है कि वह आपकी सेवा कर रहे हैं, हालाँकि आप उन्हें स्वर्गलोक या मुक्ति तक दे सकते हैं।
O Lord, before You is Maharaja Nabhi, whose ultimate goal in life is to have a son like You. O Lord, his situation is like that of a person who goes to a very rich man to ask for a little grain. He is worshiping You only because of the desire to have a son, although You are capable of granting him any exalted position—whether it be heaven or the attainment of liberation in the abode of the Lord.
तात्पर्य
पुरोहित थोड़े शर्मिंदा थे कि राजा नाभि प्रभु के आशीर्वाद पाने के लिए ही विशाल यज्ञ कर रहे थे। प्रभु उन्हें स्वर्गीय या वैकुण्ठा लोक की पदोन्नती दे सकते थे। श्री चैतन्य महाप्रभु ने हमें सिखाया है कि भगवान से कैसे प्रार्थना करें और उनसे अंतिम आशीर्वाद प्राप्त करें। उन्होंने कहा: न धनं न जनं न सुन्दरीं कवितां वा जगदीश कामये। वह भगवान से भौतिक चीज़ों के लिए प्रार्थना नहीं करना चाहते थे। भौतिक संपन्नता में दौलत, एक अच्छा परिवार, एक अच्छी पत्नी और कई अनुयायी शामिल हैं, लेकिन एक बुद्धिमान भक्त भगवान से भौतिक चीज़ों के लिए प्रार्थना नहीं करता है। उनकी एकमात्र प्रार्थना है: मम जन्मनि जन्मनीश्वरे भवताद् भक्तिर अहैतुकी त्वयी। वह प्रभु की प्रेममयी सेवा में सदा लीन रहना चाहते हैं। वह स्वर्गीय पदोन्नति या मुक्ति, भौतिक बंधन से मुक्ति नहीं चाहते हैं। यदि ऐसा होता, तो श्री चैतन्य महाप्रभु ने मम जन्मनि जन्मनि नहीं कहा होता। एक भक्त के लिए यह कोई मायने नहीं रखता है कि वह जन्म लेता है या नहीं, जब तक वह भक्त बना रहता है। वास्तव में शाश्वत स्वतंत्रता का अर्थ है ईश्वर के पास अपने घर लौटना। एक भक्त कभी भी भौतिक चीज़ों के बारे में चिंतित नहीं होता है। हालाँकि नाभि महाराज विष्णु के समान एक पुत्र चाहते थे, लेकिन ईश्वर जैसा पुत्र चाहना भी इंद्रियतृप्ति का ही एक रूप है। एक शुद्ध भक्त केवल प्रभु की प्रेममयी सेवा में लीन रहना चाहता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥