असङ्गनिशितज्ञानानलविधूताशेषमलानां भवत्स्वभावानामात्मारामाणां मुनीनामनवरतपरिगुणितगुणगण परममङ्गलायनगुणगणकथनोऽसि ॥ ११ ॥
अनुवाद
हे ईश्वर, सारे विचारशील मुनि और साधु पुरुष हमेशा आपके दैवीय गुणों को गाते जा रहे हैं। इन मुनियों ने पहले से ही अपनी ज्ञान-आग से असीम गंदगी को जला डाला है और इस दुनिया से अपना वैराग्य मजबूत कर लिया है। इस प्रकार उन्होंने आपके गुणों को प्राप्त किया और आत्म-तुष्ट हैं। फिर भी जिन्हें आपके गुणों को जपने में परमानंद आता है, उनके लिए भी आपका दर्शन दुर्लभ है।
O Lord, all the thoughtful sages and saints are constantly singing praises of Your divine qualities. These sages have already burnt the immense amount of impurities with the fire of their knowledge and strengthened their detachment from this world. Thus they are self-satisfied by accepting Your qualities. Still, Your Darshan is difficult even for those who get immense joy in singing praises of Your qualities.
तात्पर्य
महाराज नाभि के यज्ञशाला के पुरोहित सर्वोच्च भगवान विष्णु के अपनी उपस्थिति का स्वागत करते थे और इसे अपना सौभाग्य मानते थे। यहाँ तक कि महान संतों और विद्वानों को भी भगवान विष्णु के दर्शन दुर्लभ होते हैं, जो इस भौतिक संसार से पूरी तरह से अलग हो चुके होते हैं और निरंतर भगवान की महिमा का जाप करते रहने से जिनका हृदय शुद्ध हो जाता है। ऐसे लोगों को भगवान के अलौकिक गुणों का जाप करने मात्र से ही संतुष्टि हो जाती है। भगवान की निजी उपस्थिति की वास्तव में आवश्यकता नहीं होती। पुरोहित यहाँ यह कहना चाह रहे हैं कि ऐसे महान ऋषियों के लिए भी भगवान की निजी उपस्थिति बहुत ही दुर्लभ है, लेकिन उन्होंने उन पर इतनी कृपा की है कि अब वे व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हैं। इसलिए, पुरोहित बहुत आभारी थे।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥