भगवान सर्वोच्च व्यक्तित्व सभी के समान हैं। उस अर्थ में, उनका कोई शत्रु नहीं है और कोई मित्र नहीं है। हर कोई अपने काम के फलदायी परिणामों का आनंद ले रहा है, और प्रभु, हर किसी के दिल में, देख रहे हैं और हर किसी को वांछित परिणाम दे रहे हैं। हालाँकि, जिस तरह भक्त हमेशा सर्वोच्च भगवान को हर तरह से संतुष्ट देखने के लिए उत्सुक रहते हैं, उसी तरह सर्वोच्च भगवान अपने भक्तों के सामने खुद को प्रस्तुत करने के लिए बहुत उत्सुक रहते हैं। श्री कृष्ण भगवद गीता (4.8) में कहते हैं:
परित्राणाय साधूनां
विनाशाय च दुष्कृताम्
धर्म-संस्थापनार्थाय
सम्भवामि युगे युगे
"पवित्रों को बचाने के लिए, दुष्टों का नाश करने के लिए और धर्म के सिद्धांतों को फिर से स्थापित करने के लिए, मैं स्वयं सहस्राब्दियों बाद सहस्राब्दियों में प्रकट होता हूं।"
इस प्रकार कृष्ण का प्रकट होना उनके भक्तों की मुक्ति और संतुष्टि के लिए हैं। वास्तव में वे स्वयं को राक्षसों को मारने के लिए प्रस्तुत नहीं करते, क्योंकि काम उनके एजेंटों द्वारा किया जा सकता है। महाराजा नाभि के यज्ञीय क्षेत्र में भगवान विष्णु का अवतार केवल राजा और उनके सहायकों को खुश करने के लिए था। अन्यथा उनके वहां उपस्थित होने का कोई कारण नहीं था।
