श्रीशुक उवाच
नाभिरपत्यकामोऽप्रजया मेरुदेव्या भगवन्तं यज्ञपुरुषमवहितात्मायजत ॥ १ ॥
अनुवाद
शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा- आग्नीध्र के पुत्र महाराज नाभि को संतान की इच्छा हुई। इसलिए उन्होंने पूरे मन से उन भगवान विष्णु की स्तुति और आराधना शुरू की, जो सारे यज्ञों के उपभोक्ता और स्वामी हैं। उस समय तक महाराज नाभि की पत्नी मेरुदेवी की कोई औलाद नहीं हुई थी, अतः वह भी अपने पति के साथ भगवान विष्णु की पूजा करने लगी।
Sukadeva Goswami further said—Maharaja Nabhi, son of Agnidhra, desired to have a child, so he started worshipping Lord Vishnu, the enjoyer and master of all sacrifices, with utmost devotion. Till that time Maharaja Nabhi's wife Merudevi had not given birth to any child, so she also started worshipping Lord Vishnu along with her husband.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥