Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
bhagavat 5.26.33: जो लोग इस जीवन में ईर्ष्यालु सांपों की तरह क्रोधित स्वभाव वाले होते हैं और अन्य जीवों को पीड़ा पहुंचाते रहते हैं, उनकी मृत्यु के बाद, उन्हें दंडशूक नामक नरक में जाना पड़ता है। हे राजन! इस नरक में पाँच या सात फन वाले सांप हैं, जो इन पापियों को उसी तरह खा जाते हैं, जैसे सांप चूहों को खाते हैं।   |   bhagavat अध्याय 5.26: नारकीय लोकों का वर्णन   ।   bhagavat स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 26: नारकीय लोकों का वर्णन  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  5.26.33 
ये त्विह वै भूतान्युद्वेजयन्ति नरा उल्बणस्वभावा यथा दन्दशूकास्तेऽपि प्रेत्य नरके दन्दशूकाख्ये निपतन्ति यत्र नृप दन्दशूका: पञ्चमुखा: सप्तमुखा उपसृत्य ग्रसन्ति यथा बिलेशयान् ॥ ३३ ॥
 
 
अनुवाद
जो लोग इस जीवन में ईर्ष्यालु सांपों की तरह क्रोधित स्वभाव वाले होते हैं और अन्य जीवों को पीड़ा पहुंचाते रहते हैं, उनकी मृत्यु के बाद, उन्हें दंडशूक नामक नरक में जाना पड़ता है। हे राजन! इस नरक में पाँच या सात फन वाले सांप हैं, जो इन पापियों को उसी तरह खा जाते हैं, जैसे सांप चूहों को खाते हैं।
 
Those who in this life torment other beings with a temperament like jealous serpents fall after death into the hell called Dandasukha. O King, in this hell there are serpents with five or seven hoods who devour these sinful souls in the same manner as serpents devour mice.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)