श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 26: नारकीय लोकों का वर्णन  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  5.26.20 
यस्त्विह वा अगम्यां स्त्रियमगम्यं वा पुरुषं योषिदभिगच्छति तावमुत्र कशया ताडयन्तस्तिग्मया सूर्म्या लोहमय्या पुरुषमालिङ्गयन्ति स्त्रियं च पुरुषरूपया सूर्म्या ॥ २० ॥
 
 
अनुवाद
यदि कोई पुरुष या स्त्री विपरीत लिंग के उस सदस्य के साथ संभोग करे जो अगम्य हो, तो मृत्यु के पश्चात यमराज के सहायक उसे तप्तसूर्मि नामक नरक में दंड देते हैं। वहाँ पर ऐसे पुरुषों और स्त्रियों को कोड़े से पीटा जाता है। पुरुष को जलती हुई लोहे की स्त्री से और स्त्री को ऐसी ही पुरुष से आलिंगन कराया जाता है। व्यभिचार के लिए यह दंड दिया जाता है।
 
If a man or woman has sexual intercourse with an unaccustomed member of the opposite sex, then after death the messengers of Yamaraja punish him in a hell called Taptasurimi. There such men and women are beaten with whips. The man is made to embrace a woman made of hot iron and the woman is made to embrace a similar male statue. Such is the punishment for adultery.
तात्पर्य
सामान्य रूप से एक पुरुष को अपनी पत्नी के अतिरिक्त किसी भी अन्य महिला के साथ यौन संबंध नहीं बनाने चाहिए। वैदिक सिद्धांतों के अनुसार किसी अन्य पुरुष की पत्नी उसकी माता के समान मानी जाती है और माता, बहन और पुत्री के साथ यौन संबंध बनाना मना है। यदि कोई दूसरे पुरुष की पत्नी के साथ अवैध यौन संबंध बनाता है तो उसकी गतिविधि अपनी माँ के साथ यौन संबंध बनाने के समान मानी जाती है। यह कृत्य अत्यधिक पापपूर्ण है। यही सिद्धांत एक महिला पर भी लागू होता है; यदि वह किसी अन्य पुरुष के साथ यौन संबंध बनाती है जो उसका पति नहीं है, तो वह गतिविधि उसके पिता या पुत्र के साथ यौन संबंध बनाने के समान है। अवैध यौन जीवन हमेशा निषिद्ध होता है, और कोई भी पुरुष या महिला जो इसमें लिप्त होता है उसको इस श्लोक में वर्णित तरीके से दंडित किया जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)