श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 26: नारकीय लोकों का वर्णन  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  5.26.2 
ऋषिरुवाच
त्रिगुणत्वात्कर्तु: श्रद्धया कर्मगतय: पृथग्विधा: सर्वा एव सर्वस्य तारतम्येन भवन्ति ॥ २ ॥
 
 
अनुवाद
महामुनि शुकदेव ने कहा - हे राजन, इस संसार में तीन प्रकार के कार्य होते हैं - सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण में स्थित कार्य। चूँकि सभी लोग इन तीनों गुणों से प्रभावित होते हैं, इसलिए उनके कार्यों के फल भी तीन प्रकार के होते हैं। जो सत्वगुण के अनुसार कार्य करता है, वह धार्मिक और सुखी होता है। जो रजोगुण में कार्य करता है, उसे सुख-दुःख मिश्रित रूप में प्राप्त होते हैं और जो तमोगुण के वश में कार्य करता है, वह सदैव दुखी रहता है और पशुओं की तरह रहता है। विभिन्न गुणों से अलग-अलग मात्रा में प्रभावित होने के कारण जीवों को अलग-अलग गतियाँ प्राप्त होती हैं।
 
Mahamuni Shukdev said, “O King, in this world there are three types of actions situated in Satva Guna, Rajo Guna and Tamo Guna. Since all human beings are influenced by these three Gunas, hence the results of actions are also of three types. One who acts according to Satva Guna is religious and happy, one who acts in Rajo Guna gets a mixed form of pain and happiness and one who acts under the influence of Tamo Guna is always unhappy and lives like an animal. Being influenced by different Gunas in different amounts, the living beings attain different destinations.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)