श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 26: नारकीय लोकों का वर्णन  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  5.26.12 
एवमेव महारौरवो यत्र निपतितं पुरुषं क्रव्यादा नाम रुरवस्तं क्रव्येण घातयन्ति य: केवलं देहम्भर: ॥ १२ ॥
 
 
अनुवाद
जो व्यक्ति अन्य लोगों को दुख देकर खुद के शरीर का पालन करता है, उसे महारौरव नामक नरक में अवश्य भेज दिया जाता है। इस नरक की क्रव्याद नाम के रुरु जाति के राक्षस उसे सताते और उसका मांस खाते हैं।
 
A person who maintains his own body by tormenting others is said to be punished by going to a hell called Maharaurav. In this hell, a Ruru animal called Kravyad tortures him and eats his flesh.
तात्पर्य
जो पशुवत् प्राणी केवल शरीर की भावात्मक कल्पना में रहता है उसे कोई क्षमा नहीं। उसे महारौरव कहलाये जाने वाले नरक में डाल दिया जाता है, वहां उसे क्रव्याद कहलाये जाने वाले रुरु पशुओं द्वारा आक्रमण किया जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)