श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 25: भगवान् अनन्त की महिमा  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  5.25.15 
एतावतीर्हि राजन् पुंस: प्रवृत्तिलक्षणस्य धर्मस्य विपाकगतय उच्चावचा विसदृशा यथाप्रश्नं व्याचख्ये किमन्यत्कथयाम इति ॥ १५ ॥
 
 
अनुवाद
हे राजन, मैंने इस रूप से आपको बताया है कैसे लोग आमतौर पर अपनी-अपनी कामनाओं के अनुसार कर्म करते हैं और फलस्वरूप ऊँचे अथवा नीच लोकों में भिन्न-भिन्न शरीर धारण करते हैं। मेरे प्रभु, आपने मुझसे ये बातें पूछी थीं और मैंने आपको वही बताया जो मैंने ज्ञानियों से सुना है। अब आज्ञा दीजिए, और क्या कहना है?
 
O King, thus I have told you how men generally act according to their own desires and accordingly take different bodies in the higher or lower worlds. You asked me these things and I have told you what I have heard from the authorities. Now what shall I tell you further?
 
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध पांच के अंतर्गत पच्चीसवाँ अध्याय समाप्त होता है ।
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)