यस्यानुदास्यमेवास्मत्पितामह: किल वव्रे न तु स्वपित्र्यं यदुताकुतोभयं पदं दीयमानं भगवत: परमिति भगवतोपरते खलु स्वपितरि ॥ २५ ॥
अनुवाद
बलि महाराज ने कहा: मेरे पितामह प्रह्लाद महाराज ही प्रभु की भक्ति करने वाले थे। उनके पिता हिरण्यकशिपु की मृत्यु के बाद भगवान नृसिम्हदेव ने प्रह्लाद को भौतिक बंधन से मुक्ति दिलाने के साथ-साथ उनके पिता का राज भी प्रदान करना चाहते थे, लेकिन प्रह्लाद ने दोनों में से कुछ भी स्वीकार नहीं किया। पारलौकिक सुख और ऐश्वर्य को भक्ति का बाधक मानते हुए उन्होंने सोचा कि भगवान से प्राप्त ऐसे वरदान वास्तविक अनुग्रह नहीं हैं। इसलिए कर्म और ज्ञान के फलों को स्वीकार करने के बजाय प्रह्लाद महाराज ने भगवान से केवल इतना वर माँगा कि वह उनके सेवक की सेवा में लीन रह सकें।
Bali Maharaja said—My grandfather Prahlada Maharaja was the only person who recognized self-interest. After the death of his father Hiraṇyakaśipu, Lord Nṛsiṁhadeva wished to give Prahlada his father's kingdom as well as freedom from material bondage, but Prahlada accepted neither of these. He thought that liberation and material opulence were obstacles to devotion, and so to receive such boons from the Lord was not a real grace of the Lord. Consequently, not accepting the fruits of action and knowledge, Prahlada Maharaja asked the Lord for the boon of being devoted to the devotion of His servant only.
तात्पर्य
श्री चैतन्य महाप्रभु ने निर्देश दिया कि एक शुद्ध भक्त को स्वंय को सर्वोच्च भगवान् के सेवक के सेवक को सेवक (गोपी भर्तरु पाद कमलयो दास दास अनुदासः) मानना चाहिए। वैष्णव दर्शन के अनुसार, किसी को भी प्रत्यक्ष सेवक नहीं बनना चाहिए। प्रह्लाद महाराज को भौतिक दुनिया में एक संपन्न स्थिति के सभी आशीर्वाद और ब्रह्म में विलय होने का मोक्ष भी प्रदान किया गया था, लेकिन उन्होंने यह सब करने से इनकार कर दिया। वह केवल भगवान् के सेवक के सेवक के सेवक की सेवा में संलग्न होना चाहते थे। इसलिए बलि महाराज ने कहा कि क्योंकि उनके दादा प्रह्लाद महाराज ने भौतिक वैभव और भौतिक बंधन से मुक्ति के संदर्भ में सर्वोच्च व्यक्तित्व के भगवान् के आशीर्वाद को अस्वीकार कर दिया था, उन्होंने वास्तव में अपने स्वार्थ को समझा।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥