श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 24: नीचे के स्वर्गीय लोकों का वर्णन  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  5.24.21 
तद्भ‍क्तानामात्मवतां सर्वेषामात्मन्यात्मद आत्मतयैव ॥ २१ ॥
 
 
अनुवाद
प्रत्येक प्राणी के हृदय में परमचेतना परमेश्वर अधिष्ठित हैं। वे अपने भक्तों, जैसे कि नारदमुनि के हृदय में बसते हैं। दूसरे शब्दों में, प्रभु अपने भक्तों को सच्चा प्यार और भक्ति करते हैं और वे इस भक्ति के बदले खुद को अपने भक्तों के हवाले कर देते हैं। महान ऋषि-मुनि और योगी, जैसे कि चार कुमार भी परमात्मा के स्वरूप का एहसास करके दिव्य आनंद प्राप्त करते हैं।
 
Sri Bhagavan, who is situated as the Supreme Soul in the heart of every being, is sold to devotees like Narad Muni. In other words, the Supreme Lord loves such devotees and those who love Him with pure devotion. He surrenders Himself to them. Even the great self-realized Yogis, such as the four Kumaras, also realize the Supreme Soul within themselves and attain divine bliss.
तात्पर्य
भगवान बली महाराज के द्वारपाल इस लिए नही बने कि उन्होंने भगवान को सर्वस्व दे दिया अपितु इसलिए कि वे भगवान के प्रेमी के उच्च पद पर थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)