इस संबंध में, चैतन्य-चरितमानृत (अंत्य 3.177-188) भगवान के पवित्र नाम का जाप करने के प्रभाव की हरिदास ठाकुर की पुष्टि का वर्णन करता है।
केहा बाले - 'नाम हाइटे हया पाप-क्षय'
केहा बाले - 'नाम हाइटे जीवेरा मोक्ष हया'
कुछ कहते हैं कि भगवान के पवित्र नाम का जाप करने से व्यक्ति पापपूर्ण जीवन की सभी प्रतिक्रियाओं से मुक्त हो जाता है, और अन्य कहते हैं कि भगवान के पवित्र नाम का जाप करने से व्यक्ति भौतिक बंधन से मुक्ति प्राप्त करता है।
हरिदास कहना, - "नामेरे ई दुई फाला नया
नामेरे फाले कृष्ण-पड़े प्रेम उपजया
हालांकि, हरिदास ठाकुर ने कहा कि भगवान के पवित्र नाम का जाप करने का वांछित परिणाम यह नहीं है कि एक भौतिक बंधन से मुक्त हो जाता है या पापपूर्ण जीवन की प्रतिक्रियाओं से मुक्त हो जाता है। भगवान के पवित्र नाम का जाप करने का वास्तविक परिणाम यह है कि व्यक्ति अपनी निष्क्रिय कृष्ण चेतना, भगवान को अपनी प्रेममयी सेवा को जगाता है।
आनुशंगिका फाला नामेरा - 'मुक्ति', 'पाप-नाश'
ताहारा दृष्टांता जैचे सूर्येरा प्रकाश
हरिदास ठाकुर ने कहा कि मुक्ति और पापपूर्ण गतिविधियों की प्रतिक्रियाओं से मुक्ति केवल भगवान के पवित्र नाम का जाप करने के उप-उत्पाद हैं। यदि कोई भगवान के पवित्र नाम का शुद्ध रूप से जाप करता है, तो वह भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व को प्रेमपूर्ण सेवा का मंच प्राप्त करता है। इस संबंध में हरिदास ठाकुर ने एक उदाहरण दिया जिसमें पवित्र नाम की शक्ति की धूप से तुलना की गई थी।
ई श्लोकेरा अरथा कर पंडितेरा गण"
सबे कहे, - 'तुमी कहे अरथा-विवरण'
उन्होंने सभी विद्वान विद्वानों के सामने एक श्लोक रखा, लेकिन विद्वान विद्वानों ने उन्हें श्लोक का उद्देश्य बताने के लिए कहा।
हरिदास कहना, - "जैचे सूर्येरा उदय
उदय ना हाइटे आरंभे तामेरा हया क्षय
हरिदास ठाकुर ने कहा कि जैसे ही सूर्य उदय होना शुरू होता है, वह धूप दृश्यमान होने से पहले भी रात के अंधेरे को दूर कर देता है।
चौरा-प्रेता-राक्षसादिरा भया हया नाश
उदय हाइल धर्मा-कर्मा-आदि पराकाश
सूर्योदय होने से पहले ही, भोर का प्रकाश चोरों, भूतों और राक्षसों द्वारा व्यवधानों जैसे रात के खतरों के डर को नष्ट कर देता है, और जब वास्तव में धूप दिखाई देती है, तो व्यक्ति अपने कर्तव्यों में संलग्न होता है।
ऐचे नामोदयारेम्भे पाप-आदिरा क्षय
उदय काइल कृष्ण-पड़े हया प्रेमोदय
इसी तरह, भगवान के पवित्र नाम का जाप शुद्ध होने से पहले ही, सभी पापपूर्ण प्रतिक्रियाओं से मुक्त हो जाता है, और जब वह शुद्ध रूप से जाप करता है तो वह कृष्ण का प्रेमी बन जाता है।
'मुक्ति' तुच्छा-फाला हया नामभास हाइटे
ये मुक्ति भक्त ना लया, से कृष्ण चाहे दिते“
एक भक्त मुक्ति को कभी स्वीकार नहीं करता है, भले ही कृष्ण उसे प्रदान करें। मुक्ति, सभी पापपूर्ण प्रतिक्रियाओं से मुक्ति, नामभास या पवित्र नाम के प्रकाश की एक झलक से पहले भी प्राप्त होती है, जब उसकी पूरी रोशनी पूरी तरह से दिखाई नहीं देती है।
नामभास अवस्था नाम-अपराध, या अपराधों के साथ पवित्र नाम का जाप, और शुद्ध जप के बीच है। भगवान के पवित्र नाम का जाप करने के तीन चरण हैं। पहले चरण में जप करते समय व्यक्ति दस प्रकार के अपराध करता है। अगले चरण में, नामभास में, अपराध लगभग बंद हो गए हैं, और व्यक्ति शुद्ध जप के मंच पर आ रहा है। तीसरे चरण में, जब व्यक्ति अपराधों के बिना हरे कृष्ण मंत्र का जाप करता है, तो कृष्ण के लिए उसका निष्क्रिय प्रेम तुरंत जाग जाता है। यह पूर्णता है।
