Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 bhagavat 5.24.19: प्रिय राजन्, बलि महाराज ने भगवान् वामनदेव को अपना सर्वस्व दान में दे दिया, किन्तु यह निष्कर्ष नहीं निकाल लेना चाहिए कि उनकी इस दानशीलता के कारण उन्हें बिल-स्वर्ग में महान सांसारिक वैभव प्राप्त हुआ। समस्त जीवों के जीवन स्रोत भगवान प्रत्येक प्राणी के हृदय में मित्र परमात्मा के रूप में निवास करते हैं और उन्हीं के आदेश पर जीव भौतिक संसार में आनंद या कष्ट भोगता है। भगवान के दिव्य गुणों का सम्मान करते हुए बलि महाराज ने अपना सर्वस्व उनके चरण कमलों में समर्पित कर दिया। हालाँकि, उनका उद्देश्य भौतिक लाभ हासिल करना नहीं था, वे तो शुद्ध भक्त बनना चाहते थे। शुद्ध भक्त के लिए मुक्ति के द्वार स्वतः ही खुल जाते हैं। किसी को यह नहीं सोचना चाहिए कि बलि महाराज को इतना ऐश्वर्य सिर्फ उनके दान के कारण ही मिला। जब कोई प्रेमवश शुद्ध भक्त बन जाता है, तो उसे भी भगवदिच्छा से उत्तम भौतिक पद प्राप्त होता है। किन्तु यह भूलकर भी नहीं सोचना चाहिए कि भक्त को भौतिक ऐश्वर्य उसकी भक्ति का परिणाम है। भक्ति का वास्तविक फल तो श्रीभगवान के प्रति शुद्ध प्रेम का जागरण है जो सभी परिस्थितियों में बना रहता है। | bhagavat अध्याय 5.24: नीचे के स्वर्गीय लोकों का वर्णन । bhagavat स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा । श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
नो एवैतत्साक्षात्कारो भूमिदानस्य यत्तद्भगवत्यशेषजीवनिकायानां जीवभूतात्मभूते परमात्मनि वासुदेवे तीर्थतमे पात्र उपपन्ने परया श्रद्धया परमादरसमाहितमनसा सम्प्रतिपादितस्य साक्षादपवर्गद्वारस्य यद्बिलनिलयैश्वर्यम् ॥ १९ ॥
अनुवाद
प्रिय राजन्, बलि महाराज ने भगवान् वामनदेव को अपना सर्वस्व दान में दे दिया, किन्तु यह निष्कर्ष नहीं निकाल लेना चाहिए कि उनकी इस दानशीलता के कारण उन्हें बिल-स्वर्ग में महान सांसारिक वैभव प्राप्त हुआ। समस्त जीवों के जीवन स्रोत भगवान प्रत्येक प्राणी के हृदय में मित्र परमात्मा के रूप में निवास करते हैं और उन्हीं के आदेश पर जीव भौतिक संसार में आनंद या कष्ट भोगता है। भगवान के दिव्य गुणों का सम्मान करते हुए बलि महाराज ने अपना सर्वस्व उनके चरण कमलों में समर्पित कर दिया। हालाँकि, उनका उद्देश्य भौतिक लाभ हासिल करना नहीं था, वे तो शुद्ध भक्त बनना चाहते थे। शुद्ध भक्त के लिए मुक्ति के द्वार स्वतः ही खुल जाते हैं। किसी को यह नहीं सोचना चाहिए कि बलि महाराज को इतना ऐश्वर्य सिर्फ उनके दान के कारण ही मिला। जब कोई प्रेमवश शुद्ध भक्त बन जाता है, तो उसे भी भगवदिच्छा से उत्तम भौतिक पद प्राप्त होता है। किन्तु यह भूलकर भी नहीं सोचना चाहिए कि भक्त को भौतिक ऐश्वर्य उसकी भक्ति का परिणाम है। भक्ति का वास्तविक फल तो श्रीभगवान के प्रति शुद्ध प्रेम का जागरण है जो सभी परिस्थितियों में बना रहता है।
O King, Bali Maharaja donated all that he had to offer to Sri Bhagavan Vamanadeva, but this does not mean that because of his donation he obtained such material opulence in the heavenly heaven. Sri Bhagavan, the life-root of all living entities, resides in the innermost being of each person as the friendly Supersoul and enjoys or suffers in this material world by His command. Pleased with the transcendental qualities of the Lord, Bali Maharaja offered all that he had at His lotus feet. But his goal was not material gain; he wanted to become a pure devotee. The doors of liberation open automatically for a pure devotee. One should not think that only because of his donation did Bali Maharaja obtain such opulence. When one becomes a pure devotee out of love, he also obtains a good material position by the will of the Lord. But one should never mistakenly think that a devotee obtains worldly opulence as a result of devotion. The real fruit of devotion is the awakening of pure love for the Lord which remains under all circumstances.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥