श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 24: नीचे के स्वर्गीय लोकों का वर्णन  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  5.24.17 
ततोऽधस्ताद्वितले हरो भगवान् हाटकेश्वर: स्वपार्षदभूतगणावृत: प्रजापतिसर्गोपबृंहणाय भवो भवान्या सह मिथुनीभूत आस्ते यत: प्रवृत्ता सरित्प्रवरा हाटकी नाम भवयोर्वीर्येण यत्र चित्रभानुर्मातरिश्वना समिध्यमान ओजसा पिबति तन्निष्ठ्यूतं हाटकाख्यं सुवर्णं भूषणेनासुरेन्द्रावरोधेषु पुरुषा: सह पुरुषीभिर्धारयन्ति ॥ १७ ॥
 
 
अनुवाद
अतललोक के नीचे वितल ग्रह है जहाँ स्वर्ण खानों के देवता भगवान शिव अपने गणों, भूतों और इसी तरह के अन्य प्राणियों के साथ रहते हैं। शिव पिता के रूप में भवानी माता के साथ मिलन करते हैं और उनके वीर्य और रज के मिश्रण से हाटकी नदी निकलती है। जब हवा के द्वारा आग प्रज्वलित हो जाती है, तो वह नदी को पी जाती है और बाहर फेंकने पर हाटक नामक सोना उत्पन्न होता है। इस लोक के असुर अपनी पत्नियों सहित उस सोने से बने आभूषणों से अपने को सजाते हैं और इस प्रकार बहुत खुशी से रहते हैं।
 
The next planet below Atal Lok is Vital where Lord Shiva, the lord of the gold mines, lives with his followers, ghosts and other such creatures. Shiva in the form of a father lives with Bhavani in the form of a mother and from the mixture of their semen and menstruation comes out a river called Hataki. When fire is ignited by the wind, it drinks up the river and when it is spit out, gold called Hatak is produced. The demons living in this world along with their wives adorn themselves with ornaments made of that gold and thus they live very happily.
तात्पर्य
ऐसा प्रतीत होता है कि जब भव और भावनी, भगवान शिव और उनकी पत्नी, यौन रूप से एकजुट होते हैं, उनके स्रावों का पायसीकरण एक रसायन बनाता है जो आग से गरम होने पर सोना पैदा कर सकता है। ऐसा कहा जाता है कि मध्ययुगीन काल के कीमियागरों ने आधार धातु से सोना बनाने की कोशिश की थी और श्रील सनातन गोस्वामी भी कहते हैं कि जब घंटी धातु को पारे के साथ उपचारित किया जाता है, तो यह सोना पैदा कर सकता है। श्रील सनातन गोस्वामी ने निम्न श्रेणी के लोगों को ब्राह्मण बनाने की दीक्षा के संबंध में इसका उल्लेख किया है। सनातन गोस्वामी ने कहा:

यथा कांचनतां याति

कांस्यं रस-विधानातः

तथा दीक्षा-विधानेन

द्विजत्वं जायते नृणाम्

"जिस प्रकार कोई पारे के साथ उपचार करके कांस्य, या घंटी धातु, को सोने में बदल सकता है, उसी प्रकार कोई निम्न जन्म वाले व्यक्ति को वैष्णव गतिविधियों में उचित रूप से दीक्षा देकर ब्राह्मण बना सकता है।" इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शियसनेस म्लेच्छों और यवनों को उचित रूप से दीक्षा देकर और उन्हें मांस खाने, नशे, अवैध सेक्स और जुए में शामिल होने से रोककर वास्तविक ब्राह्मण बनाने की कोशिश कर रहा है। जो इन चार पापपूर्ण गतिविधियों को रोकता है और हरे कृष्ण महामंत्र का जाप करता है, वह निश्चित रूप से श्रील सनातन गोस्वामी द्वारा सुझाए गए वास्तविक दीक्षा की प्रक्रिया के माध्यम से एक शुद्ध ब्राह्मण बन सकता है।

इसके अलावा, यदि कोई इस छंद से संकेत लेता है और सीखता है कि घंटी धातु को उचित रूप से गर्म करके और पिघलाकर पारे के साथ कैसे मिलाया जाए, तो कोई बहुत सस्ते में सोना प्राप्त कर सकता है। मध्ययुगीन काल के कीमियागरों ने सोना बनाने की कोशिश की, लेकिन वे असफल रहे, शायद इसलिए कि उन्होंने सही निर्देशों का पालन नहीं किया।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)