न हि तेषां कल्याणानां प्रभवति कुतश्चन मृत्युर्विना भगवत्तेजसश्चक्रापदेशात् ॥ १४ ॥
अनुवाद
वे बहुत ही सावधानी से जीवन व्यतीत करते हैं और काल रूप श्रीभगवान् के सुदर्शन चक्र के अतिरिक्त अन्य किसी भी साधन से होने वाली मृत्यु से नहीं डरते हैं।
They live extremely comfortably and are not afraid of death by any means other than the Sudarshana Chakra of Sri Bhagavan in the form of time.
तात्पर्य
यही भौतिक अस्तित्व का दोष है। पाताललोक में सब कुछ व्यवस्थित ढंग से चलाया जाता है। वहाँ सुन्दर और अच्छे आवास बनाए जाते हैं। वहाँ का वातावरण सुहाना होता है और न ही शरीर को कोई तकलीफ़ होती है और न ही मानसिक चिंता होती है लेकिन यह सारा जीवन कर्मों के हिसाब से चलता है। जिन लोगों का मन कुंद होता है वह भौतिक सुख सुविधाओं के लिए बनी भौतिकवादी सभ्यता के इस दोष को समझ नहीं पाते हैं। भौतिक सुख सुविधाओं से मानव अपने जीवन को काफी सुखद बना देता है परन्तु कितनी भी अनुकूल परिस्थितियाँ क्यों न हो, समय आने पर मृत्यु अवश्य ही आती है। आसुरी सभ्यता के अनुयायी अपने जीवन को बहुत सुखद बनाने का प्रयास करते हैं परन्तु वे मृत्यु को नहीं रोक पाते। सुदर्शन चक्र का प्रभाव इस तथाकथित भौतिक सुख को स्थायी नहीं रहने देता।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥