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bhagavat 5.22.3: विराट जगत के मूल कारण भगवान नारायण हैं। जब वेदों के पूर्ण ज्ञाता महान साधुओं ने परम पुरुष की प्रार्थना की तो वे सभी लोकों का हित करने और कर्मों को शुद्ध करने के लिए सूर्य के रूप में इस भौतिक जगत में अवतरित हुए। उन्होंने स्वयं को बारह भागों में विभाजित कर वसंत आदि ऋतुएँ बनाईं। इस प्रकार उन्होंने गर्मी, ठंड आदि ऋतु से संबंधित गुणों की रचना की।   |   bhagavat अध्याय 5.22: ग्रहों की कक्ष्याएँ   ।   bhagavat स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 22: ग्रहों की कक्ष्याएँ  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  5.22.3 
स एष भगवानादिपुरुष एव साक्षान्नारायणो लोकानां स्वस्तय आत्मानं त्रयीमयं कर्मविशुद्धिनिमित्तं कविभिरपि च वेदेन विजिज्ञास्यमानो द्वादशधा विभज्य षट्‌सु वसन्तादिष्वृतुषु यथोपजोषमृतुगुणान् विदधाति ॥ ३ ॥
 
 
अनुवाद
विराट जगत के मूल कारण भगवान नारायण हैं। जब वेदों के पूर्ण ज्ञाता महान साधुओं ने परम पुरुष की प्रार्थना की तो वे सभी लोकों का हित करने और कर्मों को शुद्ध करने के लिए सूर्य के रूप में इस भौतिक जगत में अवतरित हुए। उन्होंने स्वयं को बारह भागों में विभाजित कर वसंत आदि ऋतुएँ बनाईं। इस प्रकार उन्होंने गर्मी, ठंड आदि ऋतु से संबंधित गुणों की रचना की।
 
Lord Narayana is the root cause of the vast universe. When great sages well versed with Vedic knowledge praised the Supreme Being, he descended in this physical world in the form of the Sun for the welfare of all the worlds and for the purification of karmas. He divided himself into twelve parts and created the seasons like spring and summer. In this way, he created seasonal qualities like heat, cold etc.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)