श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 21: सूर्य की गतियों का वर्णन  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  5.21.3 
यन्मध्यगतो भगवांस्तपतपतिस्तपन आतपेन त्रिलोकीं प्रतपत्यवभासयत्यात्मभासा स एष उदगयनदक्षिणायनवैषुवतसंज्ञाभिर्मान्द्यशैघ्य्रसमानाभिर्गतिभिरारोहणावरोहणसमानस्थानेषु यथासवनमभिपद्यमानो मकरादिषु राशिष्वहोरात्राणि दीर्घह्रस्वसमानानि विधत्ते ॥ ३ ॥
 
 
अनुवाद
उस अंतरिक्ष में, ताप उत्पन्न करने वाले सभी ग्रहों का राजा सूर्य है, जो बहुत तेजस्वी है। अपने प्रकाश से, यह पूरे ब्रह्मांड को गर्म करता है और उसे उसका वास्तविक स्वरूप देता है। यह सभी जीवों को प्रकाश भी प्रदान करता है, जिससे वे चीजों को देख सकते हैं। भगवान के निर्देशों के अनुसार, यह उत्तर में, दक्षिण में या विषुवत रेखा को पार करके मंद, तेज या मध्यम गति से घूमता है। समय के साथ, यह मकर राशि के अनुसार ऊपर-नीचे और समान स्थानों पर जाता है और दिन और रात को बड़ा, छोटा या बराबर बनाता है।
 
In the middle of that space, the king of all the heat producing planets is the supremely brilliant Sun who heats the entire universe with his light and gives it its real form. It gives light to all living beings, so that they can see. As per the order of Shri Bhagwan, it becomes Uttarayan, Dakshinayan or crosses the equator and moves at slow, fast and medium speeds and goes to higher and lower and equal places in the zodiac signs like Capricorn as per the time and makes the day and night longer, shorter or equal.
तात्पर्य
भगवान् ब्रह्मा ने अपनी ब्रह्म-संहिता (5.52) में निम्नलिखित प्रार्थना की हैः

यच्चक्षुरेष सवित सवित सकलग्रहाणाम्

राजससमस्त सुरमूर्तिरशेषतेजाः

यस्याज्ञया भ्रमति संभृतकालचक्रो

गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि

"मैं गोविन्द की उपासना करता हूँ, जो मूल प्रभु है जो ईश्वर का परम व्यक्तित्व है, जिसके नियंत्रण में सूर्य, जिसे ईश्वर की आँख माना जाता है, भी अनन्त काल की निश्चित कक्षा में घूमता है। सूर्य सभी ग्रह प्रणालियों का राजा है और जिसमे ऊष्मा और प्रकाश की असीम क्षमता है। " यद्यपि सूर्य को भागवत के रूप में वर्णित किया गया है, जो सबसे शक्तिशाली है, और यद्यपि यह वास्तव में ब्रह्मांड के भीतर सबसे शक्तिशाली ग्रह है, फिर भी उसे गोविंद, कृष्ण के आदेश का पालन करना पड़ता है। सूर्य-देव उस कक्षा से एक इंच भी नहीं हटा सकते जो उन्हें बनाई गई है। इसलिए, जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में, भगवान के परम व्यक्तित्व का सर्वोच्च आदेश पूरा किया जाता है। सम्पूर्ण भौतिक प्रकृति उसके आदेशों का पालन करती है। हालाँकि, हम मूर्खतापूर्ण ढंग से भौतिक प्रकृति की गतिविधियों को बिना उनके पीछे के परम आदेश और परम व्यक्ति को समझे देखते हैं। जैसा कि भगवद-गीता में पुष्टि की गई है, मायाध्यक्षेण प्रकृति: भौतिक प्रकृति प्रभु के आदेशों को पूरा करती है, और इस प्रकार यह सुनिश्चित किया जाता है कि प्रत्येक चीज़ को क्रमबद्ध तरीके से बनाए रखा जाए।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)