Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
bhagavat 5.21.14: वायु की एक रस्सी के माध्यम से एक कोल्हू के समान, यह पहली धुरी एक दूसरी धुरी में जुड़ी है, जो इसकी चौथाई जितनी लंबी है (39,37,500 योजन या 3,15,00,000 मील)। इस दूसरी धुरी का ऊपरी सिरा वायु की रस्सी से ध्रुवलोक से जुड़ा हुआ है।   |   bhagavat अध्याय 5.21: सूर्य की गतियों का वर्णन   ।   bhagavat स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 21: सूर्य की गतियों का वर्णन  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  5.21.14 
तस्मिन्नक्षे कृतमूलो द्वितीयोऽक्षस्तुर्यमानेन सम्मितस्तैलयन्त्राक्षवद् ध्रुवे कृतोपरिभाग: ॥ १४ ॥
 
 
अनुवाद
वायु की एक रस्सी के माध्यम से एक कोल्हू के समान, यह पहली धुरी एक दूसरी धुरी में जुड़ी है, जो इसकी चौथाई जितनी लंबी है (39,37,500 योजन या 3,15,00,000 मील)। इस दूसरी धुरी का ऊपरी सिरा वायु की रस्सी से ध्रुवलोक से जुड़ा हुआ है।
 
Like a mill, this first axle is attached to another axle which is one-fourth of its length (39,37,500 yojanas or 3,15,00,000 miles). The upper part of this second axle is connected to Dhruvaloka by a rope of air.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)