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bhagavat 5.20.42: हे राजा, लोकालोक पर्वत के बाहर अलोक-वर्ष है, जिसका विस्तार पर्वत की आंतरिक चौड़ाई के बराबर है। अर्थात, १२,५०,००,००० योजन (एक अरब मील) तक फैला हुआ है। अलोक-वर्ष के परे उन लोगों का गंतव्य है जो भौतिक जगत से मुक्ति चाहते हैं। यह प्रकृति के भौतिक गुणों के अधिकार क्षेत्र से परे है, इसलिए यह पूरी तरह से शुद्ध है। श्रीकृष्ण ने ब्राह्मण के पुत्रों को वापस लाते समय अर्जुन को इसी स्थान से होकर ले गए थे।   |   bhagavat अध्याय 5.20: ब्रह्माण्ड रचना का विश्लेषण   ।   bhagavat स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 20: ब्रह्माण्ड रचना का विश्लेषण  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  5.20.42 
योऽन्तर्विस्तार एतेन ह्यलोकपरिमाणं च व्याख्यातं यद्ब‍‌हिर्लोकालोकाचलात् । तत: परस्ताद्योगेश्वरगतिं विशुद्धामुदाहरन्ति ॥ ४२ ॥
 
 
अनुवाद
हे राजा, लोकालोक पर्वत के बाहर अलोक-वर्ष है, जिसका विस्तार पर्वत की आंतरिक चौड़ाई के बराबर है। अर्थात, १२,५०,००,००० योजन (एक अरब मील) तक फैला हुआ है। अलोक-वर्ष के परे उन लोगों का गंतव्य है जो भौतिक जगत से मुक्ति चाहते हैं। यह प्रकृति के भौतिक गुणों के अधिकार क्षेत्र से परे है, इसलिए यह पूरी तरह से शुद्ध है। श्रीकृष्ण ने ब्राह्मण के पुत्रों को वापस लाते समय अर्जुन को इसी स्थान से होकर ले गए थे।
 
O King, outside the Lokaloka mountain is the Alokvarsha which is as wide as the inner width of the mountain i.e. 12,50,00,000 (twelve and a half crore) yojanas (one billion miles). Beyond the Alokvarsha is the destination of those who wish to attain liberation from the material world. It cannot be contaminated by the material qualities of nature, hence it is absolutely pure. While bringing back the sons of a Brahmin, Sri Krishna took Arjuna through this place.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)