स लोकत्रयान्ते परित ईश्वरेण विहितो यस्मात्सूर्यादीनां ध्रुवापवर्गाणां ज्योतिर्गणानां गभस्तयोऽर्वाचीनांस्त्रींल्लोकानावितन्वाना न कदाचित्पराचीना भवितुमुत्सहन्ते तावदुन्नहनायाम: ॥ ३७ ॥
अनुवाद
श्रीकृष्ण की परम इच्छा से लोकालोक नामक पर्वत ब्रह्माण्ड में सूर्य की किरणों का नियंत्रण करता है। यह पर्वत तीनों लोकों - भूर्लोक, भूवर्लोक और स्वर्लोक - की बाहरी सीमा के रूप में स्थापित है। सूर्य से लेकर ध्रुवलोक तक सभी प्रकाशमान ग्रह और नक्षत्र इस पर्वत के द्वारा निर्मित सीमा के भीतर अपनी किरणें फैलाते हैं। चूँकि यह पर्वत ध्रुवलोक से भी ऊँचा है, इसलिए यह नक्षत्रों की किरणों को रोक लेता है और वे इसके बाहर कभी नहीं फैल पातीं।
By the supreme will of Shri Krishna, the mountain named Lokalok has been established as the outer boundary of the three worlds-Bhurlok, Bhuvarlok and Svarlok-so that the rays of the sun can be controlled in the entire universe. From the sun to Dhruvalok and all the stars, all spread their rays in these three worlds within the boundary created by this mountain. Since this mountain is higher than Dhruvalok, it blocks the rays of the stars, so that they can never spread outside it.
तात्पर्य
जब हम लोक-त्रय की बात करते हैं, तो हमारा मतलब तीन प्राथमिक ग्रह प्रणालियों - भूः, भुवः और स्वः - से है, जिसमें ब्रह्मांड बंटा हुआ है। इन ग्रह प्रणालियों को चारों ओर आठ दिशाएँ घेरे हुए हैं, अर्थात् पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, उत्तर-पूर्व, दक्षिण-पूर्व, उत्तर-पश्चिम और दक्षिण-पश्चिम। लोकालोक पर्वत को सभी लोकों की बाहरी सीमा के रूप में स्थापित किया गया है ताकि ब्रह्मांड में पूरे सूर्य और अन्य प्रकाशमान वस्तुओं की किरणों का समान वितरण किया जा सके। ब्रह्मांड की विभिन्न ग्रह प्रणालियों में सूर्य की किरणों का वितरण कैसे किया जाता है इसका यह विशद विवरण बहुत ही वैज्ञानिक है। शुकदेव गोस्वामी ने इन सार्वभौमिक मामलों का वर्णन महाराज परीक्षित को किया जैसा उन्होंने अपने पूर्ववर्ती से सुना था। उन्होंने पाँच हज़ार साल पहले इन तथ्यों की व्याख्या की थी, लेकिन ज्ञान बहुत पहले से था क्योंकि शुकदेव गोस्वामी ने इसे शिष्य परंपरा के माध्यम से प्राप्त किया था। क्योंकि यह ज्ञान शिष्य परंपरा के माध्यम से स्वीकृत है, यह परिपूर्ण है। इसके विपरीत, आधुनिक वैज्ञानिक ज्ञान का इतिहास कुछ सौ साल से ज्यादा पुराना नहीं है। इसलिए, भले ही आधुनिक वैज्ञानिक श्रीमद-भागवतम की अन्य तथ्यात्मक प्रस्तुतियों को स्वीकार न करें, वे उन सही खगोलीय गणनाओं को कैसे नकार सकते हैं जो उनके द्वारा ऐसी चीजों की कल्पना करने से बहुत पहले मौजूद थीं? श्रीमद-भागवतम से इकट्ठा करने के लिए बहुत अधिक जानकारी है। हालाँकि, आधुनिक वैज्ञानिकों के पास अन्य ग्रह प्रणालियों की कोई जानकारी नहीं है, और वास्तव में, उस ग्रह के बारे में भी शायद ही कोई जानकारी है जिस पर हम अब रह रहे हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥