श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 2: महाराज आग्नीध्र का चरित्र  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  5.2.14 
योऽसौ त्वया करसरोजहत: पतङ्गोदिक्षु भ्रमन् भ्रमत एजयतेऽक्षिणी मे ।
मुक्तं न ते स्मरसि वक्रजटावरूथंकष्टोऽनिलो हरति लम्पट एष नीवीम् ॥ १४ ॥
 
 
अनुवाद
मेरा मन पहले से ही अशांत है और तुम गेंद को अपनी कमल जैसी हथेली से इधर-उधर फेंककर मेरी आँखों को बेचैन कर रहे हो। तुम्हारे घुंघराले बाल अब बिखरे हुए हैं, लेकिन तुम उन्हें सँभालने पर ध्यान नहीं दे रहे हो। क्या तुम उन्हें सँभालोगे? यह चालाक हवा स्त्रियों के प्रति आसक्त पुरुष की तरह तुम्हारे निचले वस्त्र को उठाने की कोशिश कर रही है। क्या तुम इस पर ध्यान नहीं दे रहे हो?
 
My mind is already restless and you are disturbing my eyes by throwing this ball here and there with your lotus-like palm. Your curly hair is now scattered, but you do not remember to arrange them. Why don't you arrange them? This cunning wind is trying to lift your undergarment like a lecherous man infatuated with women. Are you not aware of this?
तात्पर्य
लड़की पूर्वाचित्ति अपने हाथ में गेंद लेकर खेल रही थी. गेंद, उसके कँवल-जैसे हाथ में किसी कँवल के फूल की तरह ही दिखाई दे रही थी. उसकी हरकतों की वजह से उसके बाल खुले हुए थे और कमर पर कसा हुआ कपड़े का पट्टा भी ढीला पड़ रहा था, जैसे कि चालाक हवा उसे नंगा करने की कोशिश में लगी हुई हो. परन्तु, ऊ ने अपने बालों को संभालने या कपड़े को ठीक करने पर कुछ भी ध्यान नहीं दिया. जब आग्नीघ्र ने लड़की की नंगी सुन्दरता को देखने की कोशिश की, तो उसकी हरकतों ने उसकी आँखों को काफी विचलित कर दिया.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)