खोलावेचा सेवकेरा देख भग्य-सीमा
ब्रह्मा शिव कांडे यारा देखिया महिमा
धन जन पाँडित्य कृष्ण नाही पाई
केवल भक्तिरा वश चैतन्य -गोसाँई
“भक्त खोलावेचा के महान भाग्य को निहारो। भगवान ब्रह्मा और शिव ने उनकी महानता को देखकर आँसू बहाए। व्यक्ति धन, अनुयायियों या सीखने की किसी भी मात्रा से भगवान कृष्ण को प्राप्त नहीं कर सकता। श्री चैतन्य महाप्रभु केवल शुद्ध भक्ति द्वारा नियंत्रित हैं।" भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु का एक बहुत ही ईमानदार भक्त था जिसका नाम खोलावेचा श्रीधर था और जिसका एकमात्र व्यवसाय केले के पेड़ों की खाल से बर्तन बेचना था। जो भी आय उसके पास होती थी, वह माँ गंगा की पूजा के लिए पचास प्रतिशत का उपयोग करता था, और अन्य पचास प्रतिशत के साथ वह अपनी आवश्यकताओं के लिए प्रदान करता था। कुल मिलाकर, वह इतना गरीब था कि वह एक झोपड़ी में रहता था जिसमें एक टूटी हुई छत थी जिसमें कई छेद थे। वह पीतल के बर्तन नहीं खरीद सकता था, और इसलिए वह लोहे के बर्तन से पानी पीता था। फिर भी, वह भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु के एक महान भक्त थे। वह इस बात का एक विशिष्ट उदाहरण है कि कैसे भौतिक संपत्ति वाला एक गरीब व्यक्ति भगवान का सबसे ऊँचा भक्त बन सकता है। निष्कर्ष यह है कि व्यक्ति भगवान कृष्ण या श्री चैतन्य गोसाँई के चरणों में आश्रय भौतिक संपन्नता के माध्यम से प्राप्त नहीं कर सकता; वह आश्रय केवल शुद्ध भक्ति सेवा से ही प्राप्त होता है।
अन्याभिलाषिता-शून्यं
ज्ञान-कर्माद्य-अनावरण
आनु कुल्येन कृष्णानु-
शिलनम् भक्तिर् उत्तमा
"किसी को भौतिक लाभ या लाभ के लिए फलदायी गतिविधियों या दार्शनिक अटकलों के बिना परम प्रभु कृष्ण को अनुकूल और अनुकूल प्रेमपूर्ण सेवा प्रदान करनी चाहिए। शुद्ध भक्ति सेवा कहलाती है।"
