श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 19: जम्बूद्वीप का वर्णन  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  5.19.6 
न वै स आत्मात्मवतां सुहृत्तम:
सक्तस्त्रिलोक्यां भगवान् वासुदेव: ।
न स्त्रीकृतं कश्मलमश्नुवीत
न लक्ष्मणं चापि विहातुमर्हति ॥ ६ ॥
 
 
अनुवाद
क्योंकि भगवान श्री रामचंद्र पूर्ण परमेश्वर भगवान वासुदेव हैं, इसलिए वे इस भौतिक जगत से किसी भी तरह से जुड़े हुए नहीं हैं। वे सभी स्वयं सिद्ध आत्माओं के सबसे प्रिय भगवान और उनके घनिष्ठ मित्र हैं। वे अत्यंत ऐश्वर्यशाली हैं। इसलिए, पत्नी से अलग होने के कारण उन्हें न तो अधिक कष्ट हुआ होगा, और न ही उन्होंने अपनी पत्नी और अपने छोटे भाई लक्ष्मण का त्याग किया होगा। उनके लिए इन दोनों में से किसी एक का भी त्याग करना सर्वथा असंभव था।
 
Since Lord Ramachandra is the Supreme Personality of Godhead Vasudeva, He is not involved in this material world in any way. He is the most beloved Supersoul of all self-realized souls and their intimate friend. He is extremely opulent. Therefore, He would not have suffered much due to the separation from his wife, nor did He abandon His wife or His younger brother Lakshmana. It was absolutely impossible for Him to abandon either of them.
तात्पर्य
ईश्वर की सर्वोच्च विभूति को परिभाषित करते हुए, हम यह कहते हैं कि वह छः प्रकार के ऐश्वर्यों-धन, प्रसिद्धि, शक्ति, प्रभाव, सुंदरता और त्याग-से परिपूर्ण है। उसे त्यागी इसलिए कहा जाता है क्योंकि उसका इस भौतिक जगत की किसी भी चीज़ से कोई मोह नहीं; वह विशेष रूप से आध्यात्मिक जगत और वहाँ रहने वाले जीवों से लगाव रखता है। भौतिक जगत के सारे कार्य दुर्गा देवी के अधीन होते हैं (सृष्टि-स्थिति-प्रलय-साधन-शक्तिरेका/ छायावे यस्य भुवनानि बिभर्ति दुर्गा)। सब कुछ भौतिक ऊर्जा के कड़े नियमों और विनियमों के अधीन है, जिसका प्रतिनिधित्व दुर्गा द्वारा किया जाता है। इसलिए भगवान पूरी तरह से अलग हैं और उन्हें भौतिक जगत पर ध्यान देने की आवश्यकता नहीं है। सीता देवी आध्यात्मिक जगत की हैं। इसी तरह, भगवान लक्ष्मण, रामचंद्र के छोटे भाई, सांकर्षण के अवतार हैं, और स्वयं भगवान रामचंद्र वासुदेव हैं, जो ईश्वर का सर्वोच्च व्यक्तित्व है।

चूंकि भगवान हमेशा आध्यात्मिक रूप से योग्य हैं, इसलिए वे उन भक्तों के प्रति आसक्त हैं जो हमेशा उन्हें पारलौकिक प्रेमपूर्ण सेवा प्रदान करते हैं। वह जीवन में सत्य से जुड़े हैं, ब्राह्मणी गुणों से नहीं। वास्तव में, वह किसी भी भौतिक गुणों से कभी आसक्त नहीं होते। यद्यपि वह सभी जीवों की अंतरात्मा हैं, वह विशेष रूप से उन लोगों को प्रकट होते हैं जो आत्म-साक्षात्कारी हैं, और वह अपने ट्रान्सेंडैंटल भक्तों के दिलों को विशेष रूप से प्रिय हैं। क्योंकि भगवान रामचंद्र मानव समाज को सिखाने के लिए अवतरित हुए कि एक राजा को कितना कर्तव्यनिष्ठ होना चाहिए, इसलिए उन्होंने माता सीता और लक्ष्मण का साथ स्पष्ट रूप से छोड़ दिया। हालाँकि, वास्तव में, वह उन्हें छोड़ नहीं सकते थे। इसलिए हमें आत्म-साक्षात्कारी आत्मा से भगवान श्रीराम के कार्यों के बारे में जानना चाहिए। तब हम भगवान की ट्रान्सेंडैंटल गतिविधियों को समझ सकते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)