रामदि मूतिषु कला नियमेन तिष्ठन
नानावतारम अकरोद भुवनेषु किंतु
कृष्णः स्वयं समभवत् परमः पुमान यो
गोविन्दम आदि पुरुषं तम अहं भजामि
"मैं भगवान गोविंद की आराधना करता हूँ, जो राम, नृसिंह, और कई अंशावतारों जैसे विभिन्न अवतार रूपों में תמיד विराजमान रहते हैं, लेकिन जो कृष्ण के नाम से विख्यात भगवान हैं और जो स्वयं भी अवतार लेते हैं।" कृष्ण, जो विष्णु तत्व हैं, ने अपने आप को विष्णु रूपों में विस्तारित किया है, जिनमें भगवान रामचंद्र एक हैं। हम जानते हैं कि विष्णु तत्व को गरुड़ नाम का पक्षी ले जाता है और वह चार हाथों में विभिन्न प्रकार के हथियारों से सुसज्जित है। इसलिए हमें संदेह हो सकता है कि क्या भगवान रामचंद्र उसी श्रेणी में हैं, क्योंकि वह गरुड़ द्वारा नहीं, हनुमान द्वारा उठाए गए थे, और उनके न तो चार हाथ थे और न ही शंख, चक्र, गदा और पद्म। इसलिए यह श्लोक स्पष्ट करता है कि रामचंद्र कृष्ण (रामदि मूर्तिषु कला) के समान ही हैं। यद्यपि कृष्ण भगवान के मूल परम पुरुष हैं, लेकिन रामचंद्र उनसे भिन्न नहीं हैं। रामचंद्र भौतिक प्रकृति के गुणों से अप्रभावित हैं, और इसलिए वह प्रशांत हैं, उन गुणों से कभी विचलित नहीं होते।
जब तक कोई व्यक्ति भगवान के प्रति प्रेम से संतृप्त नहीं हो जाता, वह भगवान रामचंद्र के दिव्य मूल्य की सराहना नहीं कर सकता; वह उन्हें मांसल आँखों से नहीं देख सकता। क्योंकि रावण जैसे राक्षसों में आध्यात्मिक दृष्टि नहीं होती है, वे भगवान रामचंद्र को एक साधारण क्षत्रिय राजा मानते हैं। इसलिए रावण ने भगवान रामचंद्र की अनन्त पत्नी सीतादेवी का अपहरण करने का प्रयास किया। हालाँकि, वास्तव में रावण सीतादेवी को उनके मूल रूप में नहीं उठा ले जा सका। जैसे ही रावण के हाथों ने उन्हें छुआ, उन्होंने उन्हें एक मांसल रूप दिया, लेकिन उन्होंने अपनी मूल रूप को उनकी दृष्टि से परे रखा। इसलिए इस श्लोक में शब्द प्रत्यक प्रशांत बताते हैं कि भगवान रामचंद्र और उनकी शक्ति, देवी सीता, अपने आप को भौतिक ऊर्जा के प्रभाव से दूर रखते हैं।
उपनिषदों में कहा गया है: यम एवैष वृणुते तेन लभ्यः (कठोपनिषद 1.2.23)। सर्वोच्च भगवान, परमात्मा, भगवान का व्यक्तित्व, केवल उन लोगों द्वारा देखा या माना जा सकता है जो भक्तिपूर्ण सेवा से संतृप्त होते हैं। जैसा कि ब्रह्म-संहिता (5.38) में कहा गया है:
प्रेमानजन-च्छुरिता-भक्ति-विलोचनेन
संतः सदा हृदयेषु विलोकयंति
यम श्यामसुंदरम अचिंत्य-गुण-स्वरूपं
गोविन्दम आदि पुरुषं तम अहं भजामि
" मैं प्रधान भगवान गोविंद की पूजा करता हूँ, जिसे हमेशा उस भक्त द्वारा देखा जाता है जिसकी आँखों पर प्रेम के गूदे का लेप लगाया जाता है। उसे श्यामसुंदर के अपने शाश्वत रूप में देखा जाता है, जो भक्त के हृदय में स्थित होता है।" इसी तरह, छान्दोग्य उपनिषद में यह कहा गया है, "एतास तिस्रो देवता अनेन जीवेन।" छान्दोग्य उपनिषद के इस श्लोक में 'अनेन' शब्द का उपयोग आत्मा और परमात्मा को दो अलग-अलग पहचान के रूप में अलग करने के लिए किया गया है। 'तिस्रो देवता' शब्द इंगित करता है कि जीवित इकाई का शरीर तीन भौतिक तत्वों से बना है - आग, पृथ्वी और जल। यद्यपि परमात्मा जीवत्मा के हृदय में प्रवेश करता है, जो भौतिक शरीर से प्रभावित और नामित है, परमात्मा का जीवत्मा के शरीर से कोई लेना-देना नहीं है। क्योंकि परमात्मा का कोई भौतिक संबंध नहीं है, इसलिए यहाँ उनका वर्णन 'अनामा-रूपं निरहम' के रूप में किया गया है। परमात्मा की कोई भौतिक पहचान नहीं है, जबकि जीवत्मा की होती है। जीवत्मा अपने आप को भारतीय, अमेरिकी, जर्मन आदि के रूप में पेश कर सकता है, लेकिन परमात्मा का ऐसा कोई भौतिक पदनाम नहीं होता है, और इसलिए उनके पास कोई भौतिक नाम नहीं है। जीवत्मा अपने नाम से अलग है, लेकिन परमात्मा नहीं है; उनका नाम और स्वयं एक ही हैं। यही 'निरहम' का अर्थ है, जिसका अर्थ है "भौतिक पदनाम के बिना।" इस शब्द को उसका अर्थ बदलकर यह तोड़ा नहीं जा सकता कि परमात्मा के पास कोई अहंकार नहीं है, कोई "मैं-भाव" या पहचान नहीं है। उनकी सर्वोच्च के रूप में अपनी पारलौकिक पहचान है। यह श्रील जीव गोस्वामी द्वारा दिया गया स्पष्टीकरण है। विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर द्वारा दी गई एक अन्य व्याख्या के अनुसार, 'निरहम' का अर्थ है निर्निश्चयेन अहम्। 'निरहम' का मतलब यह नहीं है कि सर्वोच्च भगवान की कोई पहचान नहीं है। इसके बजाय, 'अहम्' शब्द द्वारा दिया गया बल इस बात को दृढ़ता से साबित करता है कि उनकी अपनी व्यक्तिगत पहचान है क्योंकि 'निर्' का अर्थ न केवल "नकारात्मक" है बल्कि "दृढ़ निश्चय" भी है।
