अकामः सर्व-कामो वा
मोक्ष-काम उदार-धीः
तीव्रेण भक्ति-योगेन
यजेत पुरुषं परम्
"चाहे कोई भौतिक इच्छाओं से मुक्त हो, भौतिक इच्छाओं से भरा हो, या परमात्मा के साथ एक होने की इच्छा रखता हो, उसे भक्ति सेवा में लगना चाहिए।" इस तरह से, न केवल भक्त की इच्छाएँ पूरी होंगी, बल्कि वह दिन आएगा जब उसे भगवान के चरण कमलों की सेवा करने के अलावा और कोई इच्छा नहीं होगी। जो भगवान की सेवा को कुछ उद्देश्य के साथ करता है उसे साकाम भक्त कहा जाता है, और जो भगवान की सेवा बिना किसी उद्देश्य के करता है उसे अकाम भक्त कहा जाता है। कृष्ण इतने दयालु हैं कि वे एक साकाम भक्त को अकाम भक्त बना देते हैं। एक शुद्ध भक्त जो अकाम भक्त है, उसकी कोई भौतिक इच्छा नहीं है, वह भगवान के चरण कमलों की सेवा करने में ही संतुष्ट रहता है। इसकी पुष्टि भगवद गीता (6.22) में भी की गई है। यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः: यदि कोई भगवान के चरण कमलों की सेवा में लगा हुआ है, तो उसे और कुछ नहीं चाहिए। यह भक्ति सेवा का उच्चतम स्तर है। भगवान एक साकाम भक्त जो प्रेरित होता है, के प्रति भी इतने दयालु हैं कि वे उसकी इच्छाओं को इस तरह से पूरा करते हैं कि एक दिन वह अकाम भक्त बन जाता है। उदाहरण के लिए, ध्रुव महाराज अपने पिता के राज्य से बेहतर राज्य पाने के उद्देश्य से भक्त बने, लेकिन अंततः वे एक अकाम भक्त बन गये और उन्होंने भगवान से कहा, स्वामिन कृतार्थोऽस्मि वरं न याचे: "हे मेरे प्रभु, मैं आपके चरण कमलों की सेवा करने से ही बहुत संतुष्ट हूं। मुझे कोई भौतिक लाभ नहीं चाहिए।" कभी-कभी ऐसा पाया जाता है कि छोटे बच्चे गंदगी खाते हैं, लेकिन उनके माता-पिता गंदगी को हटाकर बच्चे को संदेश या कोई और मिठाई देते हैं। जो भक्त भौतिक वरदान की कामना करते हैं, उनकी तुलना ऐसे ही बच्चों से की जाती है। भगवान इतने दयालु हैं कि वे उनकी भौतिक इच्छाओं को दूर कर देते हैं और उन्हें सर्वोच्च वरदान देते हैं। इसलिए, भौतिक उद्देश्यों के लिए भी, किसी को भगवान के अलावा किसी और की पूजा नहीं करनी चाहिए; व्यक्ति को भगवान की भक्ति सेवा में स्वयं को पूरी तरह से लगा देना चाहिए ताकि उसकी सभी इच्छाएं पूरी हो सकें और अंत में वह अपने घर, भगवान के पास वापस जा सके। इसे चैतन्य चरितामृत (मध्य 22.37-39, 41) में इस प्रकार बताया गया है।
अन्यकामी - एक भक्त भगवान के चरण कमलों की सेवा के अलावा कुछ और चाह सकता है; यदि करे कृष्णेर भजन - परंतु यदि वह भगवान कृष्ण की सेवा में लगा हुआ है; ना मागितेहा कृष्ण उसे देना स्व-चरण - कृष्ण उसे अपने चरण कमलों में आश्रय देते हैं, भले ही वह इसकी कामना न करे। कृष्ण कह - भगवान कहते हैं; आमा भजे - "वह मेरी सेवा में लगा हुआ है"; मांगे विषय-सुख - "परंतु वह भौतिक इंद्रिय संतुष्टि का लाभ चाहता है।" अमृत छोड़ि विष मांगे: - "ऐसा भक्त उस व्यक्ति की तरह है जो अमृत की जगह विष मांगता है।" एई बाड़ा मूर्ख: "वह मूर्ख है।" अमी-विज्ञा: "लेकिन मैं अनुभवी हूं।" एई मूर्खे 'विषय' केने दिबा: "मैं ऐसे मूर्ख व्यक्ति को भौतिक भोग की गंदी चीजें क्यों दूं?" स्व-चरण-मृता: "उसे अपने चरण कमलों में आश्रय देना मेरे लिए बेहतर होगा।" 'विषय' भुलईबा: "मैं उसे सभी भौतिक इच्छाओं को भूलने में मदद करूंगा।" काम लागि कृष्ण भजे - यदि कोई इंद्रिय संतुष्टि के लिए भगवान की सेवा में लगा हुआ है; पाय कृष्ण-रस - परिणाम यह होता है कि अंततः भगवान के चरण कमलों की सेवा करने का उसे स्वाद मिलता है। काम छोड़ि 'दास' हते हया अभिलाषे: तब वह सभी भौतिक इच्छाओं को छोड़ देता है और भगवान का शाश्वत सेवक बनना चाहता है।
