प्राप्ता नृजातिं त्विह ये च जन्तवो
ज्ञानक्रियाद्रव्यकलापसम्भृताम् ।
न वै यतेरन्नपुनर्भवाय ते
भूयो वनौका इव यान्ति बन्धनम् ॥ २५ ॥
अनुवाद
भारत भूमि पर भक्ति का अनुष्ठान करने के लिए सर्वोत्तम स्थान और परिस्थितियाँ हैं, जिससे ज्ञान और कर्म के परिणामों से मुक्ति मिल सकती है। यदि कोई व्यक्ति भारत भूमि में मनुष्य शरीर प्राप्त करता है, जिसके पास संकीर्तन-यज्ञ करने के लिए स्पष्ट संवेदी अंग हैं, लेकिन फिर भी वह इस अवसर का लाभ नहीं उठाता और भक्ति सेवा नहीं करता, तो वह निश्चित रूप से मुक्त किए गए जंगली जानवरों और पक्षियों की तरह है जो लापरवाह होते हैं और इसलिए एक शिकारी द्वारा फिर से बंदी बना लिए जाते हैं।
There are suitable areas and circumstances available in India for devotion, by which devotion one can be freed from the fruits of knowledge and karma. If someone in India takes human form and does not perform Sankirtan-Yagya, then he is like those wild animals and birds who remain careless even after being set free and are captured again by the hunter.
तात्पर्य
भारत-वर्ष की भूमि पर कोई भी व्यक्ति संकीर्तन-यज्ञ को बहुत आसानी से कर सकता है जिसमें श्रावणं कीर्तनं विष्णोः होता है, या व्यक्ति भक्ति सेवा के अन्य तरीकों का अनुसरण कर सकता है, जैसे स्मरणं वंदनं अर्चनं दास्यं सख्यम और आत्म-निवेदनम। भारत-वर्ष में व्यक्ति को कई पवित्र स्थलों पर जाने का अवसर मिलता है, ख़ास तौर पर भगवान चैतन्य के जन्मस्थान और भगवान कृष्ण के जन्मस्थान - नवद्वीप और वृंदावन - जहाँ कई विशुद्ध भक्त रहते हैं जिनकी कोई और इच्छा नहीं होती सिवाय भक्ति सेवा (अन्याभिलाषिता-शून्यं ज्ञान-कर्मद्य-अनावृतं) के निष्पादन के, और व्यक्ति इस प्रकार भौतिक स्थितियों की बंधनों से मुक्त हो सकता है। ज्ञान का मार्ग और कर्म का मार्ग जैसे अन्य मार्ग बहुत लाभदायक नहीं हैं। धार्मिक कार्यकलाप किसी को भी उच्च ग्रह प्रणालियों में ले जा सकते हैं, और विचारात्मक ज्ञान से कोई भी ब्रह्म के अस्तित्व में विलीन हो सकता है, लेकिन वह वास्तविक लाभ नहीं है, क्योंकि ब्रह्म में विलीन होने की मुक्त स्थिति से भी किसी को नीचे उतरना पड़ता है, और निश्चित रूप से किसी को स्वर्गिक साम्राज्य से नीचे उतरना होगा। व्यक्ति को अपने घर, भगवान के पास (यांति मद-याजिनोपि माम) वापस जाने का प्रयास करना चाहिए। अन्यथा मानव जीवन और जंगल के जानवरों और पक्षियों के जीवन में कोई अंतर नहीं है। जानवरों और पक्षियों को भी स्वतंत्रता होती है, लेकिन उनके जन्म के निम्न स्तर की वजह से, वे उसका उपयोग नहीं कर सकते। भारत-वर्ष की भूमि में जन्म लेने वाले मानव को दी गई सभी सुविधाओं का लाभ उठाते हुए, व्यक्ति को एक पूर्ण रूप से प्रबुद्ध भक्त बनना चाहिए और अपने घर, भगवान के पास वापस जाना चाहिए। यह कृष्ण चेतना आंदोलन का विषय है। भारत-वर्ष के अलावा अन्य स्थानों के निवासियों के पास भौतिक सुखों के लिए सुविधाएं हैं, लेकिन उनके पास कृष्ण की चेतना की स्थिति तक जाने की एक जैसी सुविधा नहीं है। इसलिए श्री चैतन्य महाप्रभु ने सलाह दी है कि जिस व्यक्ति ने भारत-वर्ष में मानव के रूप में जन्म लिया है उसे सबसे पहले स्वयं को कृष्ण का अंग मानना चाहिए, और कृष्ण चेतना की स्थिति तक पहुँचने के बाद, उसे इस ज्ञान को पूरी दुनिया में वितरित करना चाहिए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥