न यत्र वैकुण्ठकथासुधापगा
न साधवो भागवतास्तदाश्रया: ।
न यत्र यज्ञेशमखा महोत्सवा:
सुरेशलोकोऽपि न वै स सेव्यताम् ॥ २४ ॥
अनुवाद
जहाँ श्री भगवान की कथा रूपी शुद्ध गंगा बहती नहीं है और जहाँ धर्म रूपी नदी के किनारे सेवक नहीं रहते हैं या जहाँ संकीर्तन-यज्ञ का उत्सव नहीं मनाया जाता, वहाँ बुद्धिमान पुरुष की रुचि नहीं रहती है। (क्योंकि इस युग में विशेष रूप से संकीर्तन-यज्ञ की अनुशंसा की गई है)।
A wise man is not interested in a place where the pure Ganges of the story of Shri Bhagwan does not flow and where devotees are not engrossed in service on the banks of such a river of purity, or where Sankirtan-Yagna festivals are not celebrated to please Shri Bhagwan. Because (Sankirtan-Yagna is especially recommended in this age).
तात्पर्य
श्री चैतन्य महाप्रभु भारत-वर्ष में, विशेष रूप से बंगाल के नदिया जिले में प्रकट हुए थे, जहाँ नवद्वीप स्थित है। इसलिए यह निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए, जैसा कि श्रील भक्तिविनोद ठाकुर ने कहा है कि इस ब्रह्मांड के भीतर, यह पृथ्वी सबसे अच्छा ग्रह है, और इस ग्रह पर भारत-वर्ष की भूमि सर्वश्रेष्ठ है; भारत-वर्ष की भूमि में, बंगाल अभी भी बेहतर है, बंगाल में नदिया का जिला अभी भी बेहतर है, और नदिया में सबसे अच्छी जगह नवद्वीप है क्योंकि श्री चैतन्य महाप्रभु वहां हरि कृष्ण महा-मंत्र के जप की बलि शुरू करने के लिए प्रकट हुए थे। शास्त्र अनुशंसा करते हैं: कृष्ण-वर्णं त्विषाकृष्णं सांगोपांगास्त्र-पार्षदम् यज्ञैः संकीर्तन-प्रायैर् यजन्ति हि सुमेधसः भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु हमेशा अपने बहुत ही गोपनीय सहयोगियों जैसे श्री नित्यानंद, श्री गदाधर और श्री अद्वैत और श्रीवास जैसे कई भक्तों के साथ होते हैं। वे हमेशा भगवान का नाम जपने में लगे रहते हैं और हमेशा भगवान कृष्ण का वर्णन करते हैं। इसलिए यह ब्रह्मांड के सभी स्थानों में सर्वश्रेष्ठ है। कृष्ण चेतना आंदोलन ने मायापुर में अपना केंद्र स्थापित किया है, जो भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु का जन्मस्थान है, ताकि लोगों को वहां जाने और निरंतर संकीर्तन-यज्ञ का त्योहार मनाने का महान अवसर दिया जा सके, जैसा कि यहां अनुशंसित है (यज्ञेश-मखा महोत्सव) और लाखों लोगों को भोजन वितरित किया जा सके भूखे लोग आध्यात्मिक मुक्ति के लिए तड़प रहे हैं। यह कृष्ण भावना आंदोलन का मिशन है। चैतन्य-भागवत इस प्रकार इसकी पुष्टि करता है: "किसी को भी स्वर्गीय ग्रह प्रणालियों में एक स्थान पर ऊंचा उठने की इच्छा नहीं करनी चाहिए यदि उसमें भगवान के व्यक्तित्व का विस्तार करने का कोई प्रचार नहीं है, भगवान के शुद्ध भक्त वैष्णवों का कोई निशान नहीं है, और फैलाने के लिए कोई त्यौहार नहीं है। कृष्ण भावना। माँ के गर्भ के वायुरोधी बैग के भीतर स्थायी रूप से तंग होकर रहना बेहतर होगा, जहाँ कोई कम से कम भगवान के चरण कमलों को याद रख सकता है, उस स्थान पर रहने की तुलना में जहाँ उनके चरण कमलों को याद रखने का कोई अवसर नहीं है। मैं प्रार्थना करता हूँ कि मुझे जन्म लेने की अनुमति न हो।" ऐसी निंदनीय जगह।" इसी तरह, चैतन्य-चरितामृत में, कृष्णदास कविराज गोस्वामी कहते हैं कि चूंकि श्री चैतन्य महाप्रभु संकीर्तन आंदोलन के प्रणेता हैं, जो कोई भी प्रभु को प्रसन्न करने के लिए संकीर्तन करता है वह बहुत-बहुत गौरवशाली है। ऐसा व्यक्ति पूर्ण बुद्धिमान होता है, जबकि अन्य भौतिक अस्तित्व की अज्ञानता में हैं। वैदिक साहित्य में वर्णित सभी यज्ञों में से संकीर्तन-यज्ञ का अनुष्ठान सर्वोत्तम है। सौ अश्वमेध यज्ञों का अनुष्ठान भी संकीर्तन के यज्ञ की तुलना नहीं कर सकता। श्री चैतन्य-चरितामृत के लेखक के अनुसार, यदि कोई संकीर्तन-यज्ञ की तुलना अन्य यज्ञों से करता है, तो वह पाषंडी है, एक काफिर है, और उसे यमराज द्वारा दंडित किया जाना है। कई मायावादी हैं जो सोचते हैं कि संकीर्तन-यज्ञ का प्रदर्शन एक अश्वमेध-यज्ञ और इस तरह के अन्य पवित्र कार्यों के प्रदर्शन के समान एक धर्मपरायण गतिविधि है, लेकिन यह एक नाम-अपराध है। मायावादियों के विचार के विपरीत, नारायण के पवित्र नाम का जप और अन्य नामों का जप कभी भी समान नहीं होता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥