यस्य सम्यग भगवति
ज्ञानं भक्तिस तथाइव च
निश्चितस तस्य मोक्ष: स्यात्
सर्व-पाप-कृतोऽपि तु
"जो अपने जीवनकाल के दौरान भगवान के संवैधानिक स्थिति को समझने के लिए बहुत गंभीरता से भक्ति सेवा का अभ्यास करता है, उसे इस भौतिक दुनिया से मुक्ति की गारंटी है, भले ही वह पहले पापपूर्ण आदतों का आदी हो।" भगवद् गीता में भी इसकी पुष्टि की गई है:
अपि चेत सुदुराचारो
भजते मामनन्य-भाग्
साधुर एव स मन्तव्यः
साम्यग व्यवसितो हि सः
"भले ही वह सबसे घृणित कार्य करता हो, यदि वह भक्ति सेवा में लगा हुआ है तो उसे साधु माना जाना चाहिए क्योंकि वह ठीक से स्थित है।" (भगवद् गीता 9.30) जीवन का एकमात्र उद्देश्य कृष्ण और उनके रूप, मनोरंजन, गतिविधियों और गुणों के विचारों में पूरी तरह से लीन होना है। यदि कोई इस तरह से २४ घंटे कृष्ण के बारे में सोचने में सक्षम है, तो वह पहले से ही मुक्त है (स्वरूपेण व्यवस्थितिः)। जबकि भौतिकवादी भौतिक विचारों और गतिविधियों में लीन हैं, इसके विपरीत, भक्त हमेशा कृष्ण और कृष्ण की गतिविधियों के विचारों में लीन रहते हैं। इसलिए वे पहले से ही मुक्ति के मंच पर हैं। मृत्यु के समय किसी को पूर्ण तल्लीनता के साथ कृष्ण के बारे में सोचना होगा। तब वह निश्चित रूप से घर लौटेगा, बिना किसी संदेह के वापस भगवान के पास।
