गायति चेदम्—
कर्तास्य सर्गादिषु यो न बध्यते
न हन्यते देहगतोऽपि दैहिकै: ।
द्रष्टुर्न दृग्यस्य गुणैर्विदूष्यते
तस्मै नमोऽसक्तविविक्तसाक्षिणे ॥ १२ ॥
अनुवाद
सबसे शक्तिशाली देवता, महर्षि नारद, नर-नारायण की पूजा निम्नलिखित मंत्र का जाप करके करते हैं: पूरी सृष्टि के स्वामी परमेश्वर ही सृष्टि, पालन और विनाश के अधिष्ठाता हैं, फिर भी पूर्णता के कारण उन्हें कभी अहंकार नहीं होता। हालाँकि मूर्खों के समक्ष वे हमारे जैसे शरीर धारण करते हुए प्रतीत होते हैं, लेकिन उन्हें भूख, प्यास और थकान जैसी शारीरिक कठिनाइयों से कभी कोई परेशानी नहीं होती। यद्यपि वे सब कुछ देखने वाले साक्षी हैं, फिर भी वे जो कुछ भी देखते हैं, उससे उनकी इंद्रियाँ दूषित नहीं होतीं। मैं उस अनासक्त, शुद्ध साक्षी, परमात्मा, श्रीभगवान् को बार-बार नमस्कार करता हूँ।
The all-powerful sage Narada worships Nara-Narayana by chanting the following mantra—“The Supreme Personality of Godhead is the creator, preserver and destroyer of this cosmic manifestation, yet He is completely free from false pride. Though to the ignorant He appears to have taken on a body like ours, He is not tormented by bodily discomforts such as hunger, thirst and fatigue. Though He is the all-seeing One, His senses are not defiled by the things He sees. I repeatedly offer my obeisances unto the Supreme Lord, who is the detached witness of the universe and is the Supreme Being.”
तात्पर्य
परमेश्वर, कृष्ण को सच्चिदानंद विग्रह, अनंत काल, अलौकिक आनंद और पूर्ण ज्ञान का शरीर कहा जाता है। अब इस श्लोक में उनका और अधिक विस्तार से वर्णन किया गया है। कृष्ण संपूर्ण ब्रह्मांड का सृजनकर्ता है, फिर भी वह इससे अनासक्त है। यदि हम एक बहुत ऊंचा गगनचुंबी भवन बनाते हैं, तो हम उससे बहुत जुड़ जाते हैं, लेकिन कृष्ण इतने वैरागी हैं कि यद्यपि उन्होंने सब कुछ बनाया है, फिर भी वह किसी चीज से जुड़े नहीं हैं (न बध्यते)। इसके अलावा, यद्यपि कृष्ण का दिव्य रूप सच्चिदानंद विग्रह है, पर वह जीवन की शारीरिक आवश्यकताओं से विचलित नहीं होते हैं, जिन्हें देहीक कहा जाता है; उदाहरण के लिए, उन्हें कभी भूख, प्यास या थकान नहीं होती है (न हन्यते देहगतोऽपि देहिकैः)। फिर भी, चूंकि सब कुछ कृष्ण की संपत्ति है, इसलिए वह सब कुछ देखता है और हर जगह मौजूद है, पर क्योंकि उसका शरीर दिव्य है, वह दृष्टि, दृष्टि की वस्तुओं और दृष्टि की प्रक्रिया से ऊपर है। जब हम किसी को सुंदर देखते हैं, तो हम आकर्षित होते हैं। एक सुंदर महिला को देखकर एक आदमी तुरंत आकर्षित हो जाता है, और एक पुरुष को देखकर एक महिला स्वाभाविक रूप से आकर्षित होती है। हालाँकि, कृष्ण इन सभी दोषों से परे हैं। यद्यपि वह सब कुछ देखने वाला है, पर वह दोषपूर्ण दृष्टि से पीड़ित नहीं है (न दृक् यस्य गुणैर्विदूष्यते)। इसलिए, यद्यपि वह गवाह और दर्शक है, फिर भी वह अपने द्वारा देखी जाने वाली गतिविधियों के लिए सभी स्नेह से अलग है। वह हमेशा अनासक्त और अलग रहता है; वह केवल एक गवाह है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥