श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 18: जम्बूद्वीप के निवासियों द्वारा भगवान् की स्तुति  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  5.18.39 
प्रमथ्य दैत्यं प्रतिवारणं मृधे
यो मां रसाया जगदादिसूकर: ।
कृत्वाग्रदंष्ट्रे निरगादुदन्वत:
क्रीडन्निवेभ: प्रणतास्मि तं विभुमिति ॥ ३९ ॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु, इस ब्रह्मांड में मूल सूअर के रूप में, आपने हिरण्याक्ष दानव से लड़ाई की और उसे मार डाला। फिर आपने अपने दांत के सिरे पर मुझे [पृथ्वी] को गर्भोदक सागर से उठा लिया, ठीक वैसे ही जैसे एक खेलता हुआ हाथी पानी से कमल का फूल तोड़ता है। मैं आपके सामने झुकता हूँ।
 
O Lord, in this universe, in the form of the original boar, you fought with the demon Hiranyaksha and killed him. Then, with the tip of your tusks, you lifted me, the earth, from the ocean of Garbhodaka, in the same manner as a sporting elephant plucks a lotus flower from the water. I bow down before you.
 
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध पांच के अंतर्गत अठारहवाँ अध्याय समाप्त होता है ।
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)