प्रकृति की रचना अपने आप काम नहीं करती। यह केवल इसलिए है क्योंकि भगवान भौतिक ऊर्जा पर नज़र रखते हैं कि यह अद्भुत तरीके से कार्य करता है, जैसे एक लॉजेस्टोन लोहे के टुकड़े को इधर-उधर ले जाने का कारण बनता है। क्योंकि भौतिकवादी वैज्ञानिक और तथाकथित सांख्य दार्शनिक ईश्वर में विश्वास नहीं करते, वे सोचते हैं कि भौतिक प्रकृति बिना देखरेख के काम कर रही है। लेकिन यह तथ्य नहीं है। चैतन्य-चरितामृत (आदि 6.18-19) में भौतिक जगत की रचना को निम्नलिखित रूप से समझाया गया है:
यद्यपि सांख्य माने 'प्रधान' - कारण
जड़ हते कभी नहे जगत्-सृजन
निज-सृष्टि-शक्ति प्रभु संचारे प्रधाने
ईश्वरेर शक्ते तबे हये ता' निर्माणे
"नास्तिक सांख्य दार्शनिक सोचते हैं कि कुल भौतिक ऊर्जा ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति का कारण बनती है, लेकिन वे गलत हैं। मृत पदार्थ में कोई गतिमान शक्ति नहीं होती और इसलिए वह स्वतंत्र रूप से कार्य नहीं कर सकता। भगवान भौतिक अवयवों में अपनी रचनात्मक शक्ति का संचार करते हैं। तब, भगवान की शक्ति से पदार्थ चलता है और परस्पर क्रिया करता है।" समुद्र की लहरें हवा से चलती हैं, हवा ईथर से बनती है, ईथर भौतिक प्रकृति के तीन रूपों के आंदोलन से उत्पन्न होता है, और भौतिक प्रकृति के तीनों रूप परम भगवान की कुल भौतिक ऊर्जा पर दृष्टि डालने के कारण परस्पर क्रिया करते हैं। इसलिए सभी प्राकृतिक घटनाओं की पृष्ठभूमि परम भगवान है, जैसा कि भगवद गीता में पुष्टि की गई है (मायाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते स-चराचरम)। यह आगे चैतन्य-चरितामृत (आदि 5.59-61) में भी समझाया गया है:
जगत-कारण नहे प्रकृति जड़-रूपा
शक्ति संचारिया तारे कृष्ण करे कृपा
कृष्ण-शक्ति प्रकृति हया गौण कारण
अग्नि-शक्ति लौह जैचे कराये जारण
अतएव कृष्ण मूल-जगत-कारण
प्रकृति - कारण जैचे अजा-गला-स्तन
"क्योंकि प्रकृति [भौतिक प्रकृति] सुस्त और निष्क्रिय है, वह वास्तव में भौतिक जगत का कारण नहीं हो सकती। भगवान कृष्ण अपनी ऊर्जा को नीरस, जड़ भौतिक प्रकृति में डालकर अपनी दया दिखाते हैं। इस प्रकार प्रकृति, भगवान कृष्ण की ऊर्जा से, गौण कारण बन जाती है, जैसे लोहा आग की ऊर्जा से लाल-गर्म हो जाता है। इसलिए भगवान कृष्ण ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति का मूल कारण हैं। प्रकृति एक बकरी की गर्दन पर निपल्स की तरह है, क्योंकि वे कोई दूध नहीं दे सकती।" इसलिए भौतिक वैज्ञानिकों और दार्शनिकों के यह सोचना एक बड़ी भूल है कि पदार्थ स्वतंत्र रूप से चलता है।
