भौतिक सुखों के साधन (शब्द, गंध, रूप, स्पर्श, स्वाद), इंद्रियों द्वारा की जाने वाली क्रियाएं, इंद्रियों के नियंत्रक (अर्ध-देवता), शरीर, अनंत काल और अहंकार – ये सभी आपकी भौतिक शक्ति से पैदा हुए हैं। जिन्होंने योग के माध्यम से अपनी बुद्धि को स्थिर कर लिया है, वे यह देख सकते हैं कि ये सभी तत्व आपकी भौतिक शक्ति के ही परिणाम हैं। वे आपके दिव्य रूप को भी हर चीज की पृष्ठभूमि में परम आत्मा के रूप में देख सकते हैं। इसलिए, मैं आपको बार-बार प्रणाम करता हूं।
The means of material pleasure (sound, smell, form, touch, taste), sense activities, the presiding deities of the senses, the body, eternity and ego—all these are the product of Your Maya. Those who have stabilized their intelligence through Yoga can see that all these factors are the result of Your Maya. They can also see Your transcendental form as the Supreme Self in the background of everything. Therefore, I offer my obeisances unto You again and again.
तात्पर्य
भौतिक भोग की वस्तुएं, इंद्रिय-संबंधी गतिविधियां, कामुक भोग में आसक्ति, शरीर, मिथ्या अहंकार आदि प्रभु की बाहरी ऊर्जा, माया से उत्पन्न किए जाते हैं। इन सभी गतिविधियों की पृष्ठभूमि जीव है, और जीवों का निर्देशक परमात्मा है। जीवात्मा ही सब कुछ नहीं है। उसका निर्देशन परमात्मा द्वारा किया जाता है। भगवद् गीता (15.15) में कृष्ण इस बात की पुष्टि करते हैं: सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो मत्तः स्मृतिर् ज्ञानम पोहनं च "मैं प्रत्येक के हृदय में विराजमान हूं, और मुझसे ही स्मरण, ज्ञान और विस्मृति आती है।" जीवित संस्था निर्देशों के लिए परमात्मा पर निर्भर करती है। आध्यात्मिक ज्ञान में उन्नत व्यक्ति, या रहस्यमय योग (यम, नियम, आसन आदि) के अभ्यास में विशेषज्ञ व्यक्ति पारमार्थिक को या तो परमात्मा के रूप में या भगवान के रूप में समझ सकता है। भगवान सभी प्राकृतिक घटनाओं का मूल कारण हैं। इसलिए उन्हें सर्व-कारण-कारणम, सभी कारणों के कारण के रूप में वर्णित किया गया है। हमारी भौतिक आँखों को दिखाई देने वाली हर चीज़ के पीछे कोई न कोई कारण होता है, और जो सभी कारणों के मूल कारण भगवान कृष्ण को देख सकता है, वह वास्तव में देख सकता है। कृष्ण, सच्चिदानंद-विग्रह, हर चीज की पृष्ठभूमि है, जैसा कि वह स्वयं भगवद गीता (9.10) में कहते हैं: मायाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते स-चराचरम हेतुनानेन कौंतेय जगद विपरीतर्ते "यह भौतिक प्रकृति मेरे निर्देशन में कार्य कर रही है, हे कुंती के पुत्र, और यह सभी चल और अचल प्राणियों का निर्माण कर रही है। इसके नियम से यह प्रकटीकरण बार-बार निर्मित और नष्ट होता है।"
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥