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bhagavat 5.18.34: श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा, हे राजन! सभी यज्ञों से की गई आहुतियों को स्वीकार करने वाले श्री भगवान् अपने वराह अवतार में जम्बूद्वीप के उत्तरी भाग में निवास करते हैं। वहाँ उत्तर-कुरुवर्ष में पृथ्वी माता तथा अन्य सभी निवासी निम्नलिखित उपनिषद् मंत्र का बार-बार जप करते हुए विचलित न होने वाली भक्ति के साथ उनकी आराधना करते हैं।   |   bhagavat अध्याय 5.18: जम्बूद्वीप के निवासियों द्वारा भगवान् की स्तुति   ।   bhagavat स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 18: जम्बूद्वीप के निवासियों द्वारा भगवान् की स्तुति  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  5.18.34 
उत्तरेषु च कुरुषु भगवान् यज्ञपुरुष: कृतवराहरूप आस्ते तं तु देवी हैषा भू: सह कुरुभिरस्खलितभक्तियोगेनोपधावति इमां च परमामुपनिषदमावर्तयति ॥ ३४ ॥
 
 
अनुवाद
श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा, हे राजन! सभी यज्ञों से की गई आहुतियों को स्वीकार करने वाले श्री भगवान् अपने वराह अवतार में जम्बूद्वीप के उत्तरी भाग में निवास करते हैं। वहाँ उत्तर-कुरुवर्ष में पृथ्वी माता तथा अन्य सभी निवासी निम्नलिखित उपनिषद् मंत्र का बार-बार जप करते हुए विचलित न होने वाली भक्ति के साथ उनकी आराधना करते हैं।
 
Sukadeva Goswami said, O King, the Lord who accepts all sacrificial offerings resides in the northern part of Jambudweep in the form of Varaha. There in Uttara-Kuruvarsha, Mother Earth and all other residents worship Him by repeatedly chanting the following Upanishad mantra.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)