यद्रूपमेतन्निजमाययार्पित-
मर्थस्वरूपं बहुरूपरूपितम् ।
सङ्ख्या न यस्यास्त्ययथोपलम्भनात्-
तस्मै नमस्तेऽव्यपदेशरूपिणे ॥ ३१ ॥
अनुवाद
हे मेरे भगवान, यह विशाल दिखाई देने वाला ब्रह्मांड आपकी सृजनात्मक शक्ति का प्रदर्शन है। चूँकि इस विशाल ब्रह्मांड के भीतर अनेक प्रकार के रूप केवल आपकी बाहरी ऊर्जा का प्रदर्शन हैं, यह विराट रूप आपका वास्तविक रूप नहीं है। दिव्य भावना वाले भक्त के अलावा कोई भी आपके वास्तविक रूप को नहीं समझ सकता है। इसलिए मैं आपको नमस्कार करता हूँ।
O Lord, this vast visible manifestation is a display of Your own creative power. The infinite form within it is merely a display of Your external power (Maya), hence this vast form is not Your real form. Your real form can only be seen by the divinely inspired devotees, no one else. Therefore, I offer my respectful obeisances unto You.
तात्पर्य
मायावादी विचारक ईश्वर के सार्वभौमिक स्वरूप को वास्तविक और उनके व्यक्तिगत स्वरूप को भ्रामक मानते हैं। हम उनकी गलती को एक सरल उदाहरण से समझ सकते हैं। एक अग्नि में तीन तत्व होते हैं: ऊष्मा और प्रकाश, जो अग्नि की ऊर्जा, और स्वयं अग्नि हैं। कोई भी समझ सकता है कि मूल अग्नि ही वास्तविक है और ऊष्मा और प्रकाश मात्र अग्नि की ऊर्जा है। ऊष्मा और प्रकाश अग्नि की निराकार ऊर्जाएँ हैं, और उस अर्थ में वे असत्य हैं। केवल अग्नि का ही रूप है, और इसलिए यह ऊष्मा और प्रकाश का वास्तविक रूप है। जैसा कि कृष्ण ने भगवद-गीता (9.4) में कहा है, माया ततम इदम सर्वम जगद अव्यक्त-मूर्तिना: “मेरे द्वारा, मेरे अव्यक्त रूप में। यह संपूर्ण ब्रह्मांड व्याप्त है।” इस प्रकार ईश्वर की अवैयक्तिक अवधारणा अग्नि से ऊष्मा और प्रकाश के विस्तार की तरह है। भगवद-गीता में भगवान यह भी कहते हैं, मत्-स्थाणि सर्व-भूतानि ना चाहम तेषु अवस्थितः: संपूर्ण भौतिक सृष्टि कृष्ण की ऊर्जा पर आश्रित है, चाहे भौतिक, आध्यात्मिक या सीमांत, लेकिन क्योंकि उनका रूप उनकी ऊर्जा के विस्तार से अनुपस्थित है, वे व्यक्तिगत रूप से उपस्थित नहीं हैं। परम ईश्वर की ऊर्जा के इस अचिंतनीय विस्तार को अचिंत्य-शक्ति कहा जाता है। इसलिए कोई भी उनके भक्त बने बिना भगवान के वास्तविक रूप को नहीं समझ सकता।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥