श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 18: जम्बूद्वीप के निवासियों द्वारा भगवान् की स्तुति  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  5.18.25 
ॐ नमो भगवते मुख्यतमाय नम: सत्त्वाय प्राणायौजसे सहसे बलाय महामत्स्याय नम इति ॥ २५ ॥
 
 
अनुवाद
मैं सत्त्वस्वरूप श्री भगवान को नमन करता हूँ। वे प्राण, शारीरिक शक्ति, बौद्धिक शक्ति और ज्ञानेंद्रिय शक्ति के मूल स्रोत हैं। समस्त अवतारों में सबसे पहले अवतरित हुए मत्स्यावतार के रूप में, वे विशाल मछली की तरह प्रकट हुए थे। मैं पुनः उन्हें नमन करता हूँ।
 
I bow to Sri Bhagavan who is the embodiment of Sattva. He is the original source of life, physical strength, intellectual power and sensory power. He is the Mahamatsya avatar who appears in all incarnations. I bow to Him again.
तात्पर्य
श्रील जयदेव गोस्वामी गाते हैं :

प्रलय पयोधि-जले ध्रतवान असि वेदम्

विहित-वाहित्र-चरित्रम् अखेडम्

केशव धृत-मीन-शरीर जय जगत-ईश हरि

ब्रह्माण्ड के निर्माण के तुरंत बाद, पूरा ब्रह्माण्ड पानी से भर गया था। उस समय भगवान कृष्ण (केशव) ने वेदों की रक्षा के लिए एक विशाल मछली के रूप में अवतार लिया। इसलिए मनु भगवान मत्स्य को मुख्यातम, प्रकट होने वाला पहला अवतार कहते हैं। मछलियों को आम तौर पर अज्ञानता और जुनून के मिश्रण के रूप में माना जाता है, लेकिन हमें समझना चाहिए कि भगवान का प्रत्येक अवतार पूरी तरह से पारलौकिक है। सर्वोच्च ईश्वर की मूल पारलौकिक गुणवत्ता में कभी कोई गिरावट नहीं आती है। इसलिए यहां सत्वाय शब्द का उपयोग किया गया है, जिसका अर्थ है कि पारलौकिक धरातल पर शुद्ध अच्छाई। भगवान के कई अवतार हैं: वराह मूर्ति (सूअर का रूप), कूर्म मूर्ति (कछुए का रूप), हयग्रीव मूर्ति (घोड़े का रूप) इत्यादि। फिर भी हमें कभी भी उनमें से किसी को भौतिक नहीं समझना चाहिए। वे हमेशा शुद्ध-सत, शुद्ध अलौकिकता के मंच पर स्थित होते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)