श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 18: जम्बूद्वीप के निवासियों द्वारा भगवान् की स्तुति  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  5.18.23 
स त्वं ममाप्यच्युत शीर्ष्णि वन्दितं
कराम्बुजं यत्त्वदधायि सात्वताम् ।
बिभर्षि मां लक्ष्म वरेण्य मायया
क ईश्वरस्येहितमूहितुं विभुरिति ॥ २३ ॥
 
 
अनुवाद
हे अच्युत, आपका कमल-सा हाथ सभी शुभ आशीर्वादों का स्रोत है। इसीलिए आपके शुद्ध भक्त इसकी पूजा करते हैं और आप बहुत ही दयालुता से अपना हाथ उनके सिर पर रखते हैं। मेरी भी यही इच्छा है कि आप मेरे सिर पर अपना हाथ रखें, यद्यपि आप पहले से ही अपने सीने पर श्रीलक्ष्म के रूप में मुझे धारण करते हैं, लेकिन मैं इस सम्मान को अपने लिए एक प्रकार का झूठा गौरव मानती हूं। आप अपनी वास्तविक दया अपने भक्तों पर दिखाते हैं, मुझ पर नहीं। निस्संदेह, आप सर्वोच्च पूर्ण नियंत्रक हैं, और कोई भी आपके उद्देश्यों को नहीं समझ सकता।
 
O Acyuta, Your hand is the source of all benedictions. Your pure devotees worship it and You place Your hand on their heads with great mercy. I also desire that You place Your hand on my head, although You already bear me on Your breast in the form of Srilakshma, but I consider this honour as false prestige. You show Your real mercy only to the devotees, not to me. Indeed, You are the all-powerful controller, who can understand Your purpose?
तात्पर्य
कई स्थानों पर, शास्त्रों में परमेश्वर को अपनी पत्नी की तुलना में अपने भक्तों के प्रति अधिक प्रवृत्त बताया गया है, जो हमेशा उनकी छाती पर बनी रहती है। श्रीमद्- भागवतम (11.14.15) में कहा गया है:

ना तथा मे प्रियतमा

आत्म-योनिर्न शंकरः

ना च संकर्षणो न श्रीर्

नैवात्मा च यथा भवान

यहाँ कृष्ण स्पष्ट रूप से कहते हैं कि उनके भक्त उन्हें भगवान ब्रह्मा, भगवान शिव, भगवान संकर्षण (सृष्टि का मूल कारण), भाग्य की देवी या यहाँ तक कि उनके अपने स्वयं से भी अधिक प्रिय हैं। श्रीमद्-भागवतम (10.9.20) में अन्यत्र शुकदेव गोस्वामी कहते हैं:

नेमम विरिंचो न भवो

ना श्रीर अप्य अंग संश्रया

प्रसादं लेभिरे गोपी

यत तत् प्राप विमुक्तिदात

परमेश्वर, जो किसी को भी मुक्ति प्रदान कर सकते हैं, ने भगवान ब्रह्मा, भगवान शिव या यहाँ तक कि भाग्य की देवी की तुलना में गोपियों के प्रति अधिक दया दिखाई, जो उनकी अपनी पत्नी है और उनके शरीर से जुड़ी हुई है। इसी तरह, श्रीमद्-भागवतम (10.47.60) में भी कहा गया है:

नायं श्रीयो ऽंग उ नितंता-रतेः प्रसादः

स्वर-योषितां नलिना-गंध-रुचां कुतोऽन्याः

रासौत्सवे ऽस्य भुज-दंड-गृहीत-कंठा-

लब्धाशिषां य उदगाद् व्रज-सुंदरीणां

"गोपियों को भगवान से वो आशीर्वाद प्राप्त हुए जो न तो लक्ष्मीदेवी और न ही स्वर्ग के सबसे सुंदर नर्तक प्राप्त कर पाए। रास नृत्य में, भगवान ने अपने हाथों को गोपियों के कंधों पर रखकर और उनमें से प्रत्येक के साथ व्यक्तिगत रूप से नृत्य करके सबसे भाग्यशाली गोपियों को अपना पक्ष दिखाया। कोई भी गोपियों की तुलना नहीं कर सकता, जिन्हें भगवान की निस्वार्थ दया प्राप्त हुई।"

चैतन्य-चरितामृत में कहा गया है कि कोई भी गोपियों के चरणों का अनुसरण किए बिना परमात्मा का वास्तविक पक्ष नहीं प्राप्त कर सकता। भाग्य की देवी भी गोपियों के समान पक्ष प्राप्त नहीं कर सकी, हालाँकि उसने कई वर्षों तक घोर तपस्या और तपस्या की। भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु चैतन्य-चरितामृत (मध्य 9.111-131) में व्याध्यकाट भट्ट के साथ इस बिंदु पर चर्चा करते हैं: "भगवान ने व्याध्यकाट भट्ट से पूछा, 'तुम्हारी पूजनीय भाग्य की देवी, लक्ष्मी, हमेशा नारायण की छाती पर रहती है, और वह निश्चित रूप से सृष्टि में सबसे पवित्र महिला है। हालाँकि, मेरे भगवान भगवान श्री कृष्ण हैं, एक ग्वाले लड़के जो गायों को चराने में लगे हुए हैं। ऐसा क्यों है कि लक्ष्मी, एक पवित्र पत्नी होने के नाते, मेरे भगवान से जुड़ना चाहती है? सिर्फ कृष्ण से जुड़ने के लिए, लक्ष्मी ने वैकुंठ में सभी दैवी आनंद को त्याग दिया और लंबे समय तक व्रत और नियमन सिद्धांतों को स्वीकार किया और असीमित तप का पालन किया।'

"व्याध्यकाट भट्ट ने उत्तर दिया, 'भगवान कृष्ण और भगवान नारायण एक ही हैं, लेकिन कृष्ण के मनोरंजक स्वभाव के कारण कृष्ण के मनोरंजन अधिक रमणीय हैं। वे कृष्ण की शक्तियों के लिए बहुत ही सुखद हैं। चूँकि कृष्ण और नारायण दोनों एक ही व्यक्तित्व हैं, इसलिए कृष्ण से लक्ष्मी के जुड़ाव ने उसकी पवित्रता के व्रत को नहीं तोड़ा। बल्कि, बड़े मजे में भाग्य की देवी भगवान कृष्ण से जुड़ना चाहती थी। भाग्य की देवी ने सोचा कि कृष्ण के साथ उसके संबंध से पवित्रता के उसके व्रत को कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा। बल्कि, कृष्ण से जुड़कर वह रास नृत्य का लाभ उठा सकती थी। अगर वह कृष्ण के साथ खुद का आनंद लेना चाहती है तो उसमें क्या गलती है? आप इस बारे में इतना मजाक क्यों उड़ा रहे हैं?'

"भगवान चैतन्य महाप्रभु ने उत्तर दिया, 'मुझे पता है कि भाग्य की देवी में कोई दोष नहीं है, लेकिन फिर भी वह रास नृत्य में प्रवेश नहीं कर सकी। हम इसे प्रकटित शास्त्रों से सुनते हैं। वैदिक ज्ञान के अधिकारियों ने दंडकारण्य में भगवान रामचंद्र से मुलाकात की, और उनकी तपस्या और तपस्या के द्वारा, उन्हें रास नृत्य में प्रवेश करने की अनुमति दी गई। लेकिन क्या आप मुझे बता सकते हैं कि भाग्य की देवी, लक्ष्मी को वह अवसर क्यों नहीं मिल सका?'

"इस पर व्याध्यकाट भट्ट ने उत्तर दिया, 'मैं इस घटना के रहस्य में प्रवेश नहीं कर सकता। मैं एक साधारण जीवित प्राणी हूं। मेरी बुद्धि सीमित है, और मैं हमेशा परेशान रहता हूं। मैं सर्वोच्च प्रभु के मनोरंजन को कैसे समझ सकता हूं? वे लाखों महासागरों से भी गहरे हैं।'

“प्रभु चैतन्य ने उत्तर दिया, "भगवान कृष्ण की एक विशेष विशेषता है। वह अपने व्यक्तिगत संयोगात्मक प्रेम के मधुर भाव से सभी के हृदय को आकर्षित करते हैं। वृजलोक या गोलोक वृंदावन नामक ग्रह के निवासियों के पदचिन्हों का अनुसरण करके, कोई श्री कृष्ण के चरण कमलों का आश्रय प्राप्त कर सकता है। हालाँकि, उस ग्रह के निवासी यह नहीं जानते कि भगवान कृष्ण भगवान हैं। यह अनजान रहते हुए कि कृष्ण सर्वोच्च भगवान हैं, वृंदावन के निवासी जैसे नंद महाराज, यशोदा देवी और गोपियाँ कृष्ण को अपना प्रिय पुत्र या प्रेमी मानती हैं। माता यशोदा उन्हें अपने पुत्र के रूप में स्वीकार करती हैं और कभी-कभी उन्हें एक पीसने वाले मोर्टार से बाँध देती हैं। कृष्ण के चरवाहे मित्र सोचते हैं कि वह एक साधारण लड़का है और उसके कंधों पर चढ़ जाते हैं। गोलोक वृंदावन में किसी को भी कृष्ण से प्रेम करने के अलावा कोई अन्य इच्छा नहीं है।"

निष्कर्ष यह है कि जब तक वह व्रजभूमि के निवासियों का पूर्ण अनुग्रह प्राप्त नहीं कर लेता, तब तक कोई भी कृष्ण से जुड़ नहीं सकता। इसलिए यदि कोई कृष्ण द्वारा सीधे मुक्त होना चाहता है, तो उसे भगवान के अमिश्र भक्त, वृंदावन के निवासियों की सेवा लेनी चाहिए।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)