अनन्याश्चिन्तयन्तो माम्
ये जनाः पर्युपासते
तेषां नित्याभियुक्तानां
योग-क्षेमं वहाम्यहम्
सर्वोच्च परमात्मा उन लोगों की व्यक्तिगत रूप से देखभाल करते हैं जो पूरी तरह से उनकी भक्ति सेवा में लीन रहते हैं। जो कुछ भी उनके पास है, भगवान उसकी रक्षा करते हैं, और जो कुछ भी उन्हें चाहिए, भगवान उसे प्रदान करते हैं। इसलिए मनुष्य को भौतिक सुख के लिए भगवान को परेशान क्यों करना चाहिए? इस तरह की प्रार्थनाएं अनावश्यक हैं।
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर बताते हैं कि भले ही एक भक्त भगवान से एक विशेष इच्छा की पूर्ति की कामना करता है, भक्त को सकर्म-भक्त (स्वार्थ रखने वाले भक्त) नहीं माना जाना चाहिए। भगवद गीता (7.16) में कृष्ण कहते हैं:
चतुर्विधा भजन्ते मां
जनाः सुकृतिनोऽर्जुन
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी
ज्ञानी च भरतर्षभ
"हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ [अर्जुन], चार प्रकार के धर्मी पुरुष मेरे प्रति भक्ति भाव सेवा करते हैं - संकटग्रस्त, धन के इच्छुक, जिज्ञासु और वह जो पूर्ण का ज्ञान प्राप्त करना चाहता है।" भगवान के व्यक्तित्व को दुख से राहत या धन के लिए पाने वाले आर्त और अर्थार्थी सकर्म-भक्त नहीं हैं, यद्यपि वे दिखाई देते हैं। नवोदित भक्त होने के नाते, वे केवल अज्ञानी हैं। बाद में भगवद गीता में भगवान कहते हैं, उदारः सर्व एवते: वे सभी उदार (उदारः) हैं। यद्यपि शुरुआत में एक भक्त की कुछ इच्छाएँ हो सकती हैं, समय के साथ वह इच्छाएँ गायब हो जाएंगी। इसलिए श्रीमद् भागवतम् का कहना है:
अकामः सर्व-कामो वा
मोक्ष-काम उदार-धीः
तीव्रेण भक्ति-योगेन
यजेत पुरुषं परम्
"जिस व्यक्ति के पास व्यापक बुद्धि है, चाहे वह सभी भौतिक इच्छाओं से भरा हो, वह भौतिक इच्छा से मुक्त हो, या मुक्ति की इच्छा रखता हो, उसे हर हाल में सर्वोच्च पूर्णता, ईश्वर के व्यक्तित्व की उपासना करनी चाहिए।" (भाग. 2.3.10)
यहां तक कि अगर कोई भौतिक चीज चाहता है, तो उसे अपनी इच्छा को पूरा करने के लिए भगवान के अलावा किसी और से प्रार्थना नहीं करनी चाहिए। यदि कोई अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए किसी देवता के पास जाता है, तो उसे नष्ट-बुद्धि माना जाता है, जो सभी अच्छी समझ से वंचित है। भगवद गीता (7.20) में कृष्ण कहते हैं:
कामै स्तैस्तैर हृता-ज्ञानः
प्रपद्यन्तेऽन्य-देवताः
तं तं नियममास्थाय
प्रकृत्या नियताः स्वया
"जिनके मन भौतिक इच्छाओं से भ्रष्ट हैं, वे देवताओं के प्रति समर्पण करते हैं और अपनी प्रकृति के अनुसार पूजा के विशेष नियमों और विनियमों का पालन करते हैं।" भौतिक इच्छाओं के साथ भगवान के पास आने वाले सभी भक्तों को लक्ष्मीदेवी सलाह देती हैं कि उनके व्यावहारिक अनुभव के अनुसार, भगवान कामदेव हैं, और इसलिए उन्हें भौतिक चीज़ों के लिए उनसे कुछ भी मांगने की ज़रूरत नहीं है। वह कहती हैं कि हर किसी को बिना किसी उद्देश्य के भगवान की सेवा करनी चाहिए। चूंकि सर्वोच्च ईश्वर व्यक्तित्व प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में विराजमान हैं, इसलिए वह प्रत्येक व्यक्ति के विचारों को जानते हैं, और समय के साथ वह सभी इच्छाओं को पूरा करेंगे। इसलिए हम भगवान की सेवा पर पूरी तरह से निर्भर रहें और अपने भौतिक अनुरोधों के साथ उन्हें परेशान न करें।
