परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान
पुरुषं शाश्वतं दिव्यं आदि-देवं अजं विभुम्
"आप परम ब्रह्म हैं, परम, परम निवास और पवित्रकर्ता, परम सत्य और शाश्वत दिव्य व्यक्ति हैं। आप आदिम भगवान हैं, पारलौकिक और मौलिक हैं, और आप अजन्मे और सर्वव्यापी सुंदरता हैं।"
कृष्ण मूल पुरुष हैं, और जीवित प्राणी प्रकृति हैं। इस प्रकार कृष्ण भोक्ता हैं, और सभी जीवित प्राणियों का उद्देश्य उनके द्वारा भोगा जाना है। इसलिए कोई भी महिला जो अपनी सुरक्षा के लिए भौतिक पति की तलाश करती है, या कोई भी पुरुष जो किसी महिला का पति बनना चाहता है, भ्रम में है। पति बनने का मतलब धन और सुरक्षा प्रदान करके पत्नी और बच्चों का अच्छे से भरण-पोषण करना होता है। हालाँकि, एक भौतिक पति संभवतः ऐसा नहीं कर सकता, क्योंकि वह अपने कर्म पर निर्भर है। कर्मन-देव-नेत्रेण: उसकी परिस्थितियाँ उसकी पिछली फलदायी गतिविधियों द्वारा निर्धारित की जाती हैं। इसलिए यदि कोई गर्व से सोचता है कि वह अपनी पत्नी की रक्षा कर सकता है, तो वह भ्रम में है। कृष्ण ही एकमात्र पति हैं, और इसलिए इस भौतिक जगत में पति और पत्नी के बीच का संबंध परम नहीं हो सकता। चूँकि हमारी शादी करने की इच्छा है, कृष्ण दया करके तथाकथित पति को एक पत्नी रखने की अनुमति देते हैं, और पत्नी को पारस्परिक संतुष्टि के लिए एक तथाकथित पति रखने की अनुमति देते हैं। ईशोपनिषद में कहा गया है, तेन त्यक्तेन भुंजीथा: भगवान सभी को उसका कोटा प्रदान करते हैं। वास्तव में, हालाँकि, प्रत्येक जीवित प्राणी प्रकृति, या महिला है, और कृष्ण ही एकमात्र पति हैं।
एकले ईश्वर कृष्ण, आरा सब भृत्य
यारे जैचे नाचाय, से तैचे करे नृत्य
(Cc. आदि 5.142)
कृष्ण हर किसी का मूल स्वामी या पति है, और अन्य सभी जीवित प्राणियों ने तथाकथित पति या पत्नी का रूप लेते हुए उसकी इच्छा के अनुसार नृत्य किया है। एक तथाकथित पति कामुकता की संतुष्टि के लिए अपनी पत्नी के साथ मिल सकता है, लेकिन उसकी इंद्रियों का संचालन वृषिकेश, इंद्रियों के स्वामी करते हैं, जो इसलिए वास्तविक पति है।
