तद्भगवतो मायामयं रूपं परमसमाधियोगेन रमा देवी संवत्सरस्य रात्रिषु प्रजापतेर्दुहितृभिरुपेताह:सु च तद्भर्तृभिरुपास्ते इदं चोदाहरति ॥ १७ ॥
अनुवाद
प्रजापति (दिनों के प्रमुख देवता) के पुत्रों के साथ दिन में और उनकी पुत्रियों (रात की देवता) के साथ रात में, लक्ष्मी देवी संवत्सर काल में भगवान की पूजा करती हैं जब वे कामादेव के रूप में सबसे दयालु होते हैं। भक्ति में लीन होकर, वह निम्नलिखित मंत्रों का जाप करती हैं।
During the period of Samvatsara, Lakshmiji worships God in the form of the most compassionate Kamadeva along with Prajapati's sons during the day and along with his daughters during the night. Immersed in devotion, Lakshmiji chants the following mantras.
तात्पर्य
इस श्लोक में प्रयुक्त 'मायामयम्' शब्द को मायावादियों के मत के अनुसार नहीं समझना चाहिए। माया का अर्थ स्नेह के साथ-साथ माया भी है। जब एक माँ अपने बच्चे के साथ स्नेहपूर्वक व्यवहार करती है, तो उसे मायामय कहा जाता है। श्री विष्णु भगवान किसी भी रूप में प्रकट हों, वे अपने भक्तों के प्रति हमेशा स्नेही रहते हैं। इस प्रकार मायामय शब्द का प्रयोग यहाँ 'भक्तों के प्रति बहुत स्नेही' के अर्थ में किया गया है। श्रील जीव गोस्वामी इस संबंध में लिखते हैं कि मायामय का अर्थ कृपा-प्रचुरम, गहरा दयालु भी हो सकता है। इसी तरह, श्रील वीरराघव कहते हैं, माया-प्रचुरणाकमीय-संकल्पना परृगृहीतं अर्थो ज्ञान-पर्यायोत्र माया-शब्दः: जब कोई घनिष्ठ संबंध के कारण बहुत स्नेह करता है, तो उसे मायामय कहा जाता है। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर मायामय को माया और आमायम शब्दों में विभाजित करके समझाते हैं। वे इन शब्दों से यह बताते हैं कि जीव माया के मोह से ढका होता है, इसलिए प्रभु अपने भक्त को हमेशा माया के चंगुल से मुक्त करने और मायावी ऊर्जा के कारण होने वाली बीमारी से उसे ठीक करने के लिए उत्सुक रहते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥