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bhagavat 5.18.16: केतुमालवर्ष में, भगवान कामदेव (प्रद्युम्न) बहुत ही सुंदर और आकर्षक चाल से चलते हैं। उनकी मधुर मुस्कान बहुत ही मनमोहक है और जब वे अपनी भौहों को थोड़ा ऊपर उठाकर शरारतिपूर्ण दृष्टि से देखते हैं, तो उनके चेहरे की सुंदरता और भी बढ़ जाती है और वे लक्ष्मीजी को खुश करते हैं। इस तरह वे अपनी दिव्य इंद्रियों का आनंद लेते हैं।   |   bhagavat अध्याय 5.18: जम्बूद्वीप के निवासियों द्वारा भगवान् की स्तुति   ।   bhagavat स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 18: जम्बूद्वीप के निवासियों द्वारा भगवान् की स्तुति  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  5.18.16 
अतीव सुललितगतिविलासविलसितरुचिरहासलेशावलोकलीलया किञ्चिदुत्तम्भितसुन्दरभ्रूमण्डलसुभगवदनारविन्दश्रिया रमां रमयन्निन्द्रियाणि रमयते ॥ १६ ॥
 
 
अनुवाद
केतुमालवर्ष में, भगवान कामदेव (प्रद्युम्न) बहुत ही सुंदर और आकर्षक चाल से चलते हैं। उनकी मधुर मुस्कान बहुत ही मनमोहक है और जब वे अपनी भौहों को थोड़ा ऊपर उठाकर शरारतिपूर्ण दृष्टि से देखते हैं, तो उनके चेहरे की सुंदरता और भी बढ़ जाती है और वे लक्ष्मीजी को खुश करते हैं। इस तरह वे अपनी दिव्य इंद्रियों का आनंद लेते हैं।
 
In Ketumalavarsha, Lord Kamadeva (Pradyumna) walks with great grace. His gentle smile is charming and when he looks playfully with his eyebrows raised slightly, the beauty of his face increases and he makes Goddess Lakshmi happy. In this way, he enjoys his divine senses.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)